Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 125, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 125, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 125 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
चिन्मात्रसत्तासामान्यादृतेऽन्यन्नात्म तद्विदाम् ।
दृश्यात्यन्ताभावबोधे सर्गासर्गदृशोः क्षये ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
विभिन्न-विभिन्न प्रदेशों में एक ही समय में एक की भिन्न क्रियाकारिता में तत्-तत् देशों में
व्याप्ति ही उपयोगी है, जीवभेद का कोई उपयोग नहीं है, ऐसा कहते हैं।
जैसे धूप से पीडित लोगों को सुख पहुँचानेवाला मेघ भी महान् होने के कारण ही नाना नगर, पर्वत,
नदी, खेत आदि में व्याप्त होकर एक ही काल में महलों को धोना, तटों को तोड़ना, नदी का जल
बढ़ाना, धानों को पुष्ट करना आदि विभिन्न व्यापार तत्-तत् भाग से करता है । तद्अभिमानी जीव
(मेघका अधिष्ठाता जीव) भी मैंने ये क्रियाएँ की ऐसा अनुभव करता है वैसी ही यहाँ पर भी उपपत्ति
समझनी चाहिये यह भाव है