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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 125, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 125, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 125 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इह रामाप्रबुद्धानां यदस्त्यस्त्वलमेव नः । तेन यत्तु प्रबुद्धानां तदिदं श्रृणु कथ्यते ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

जब अगस्त्य आदि योगियों का भी, जो मलय आदि नियत प्रदेश में नित्य रहते हैं, नाना देशों में अतीत, अनागत आदि कालों में योगबल से संन्निधान द्वारा सब वस्तुओं का अनुभव करना प्रसिद्ध है तब भिन्न देशों के प्रति चले हुए विपश्चितों का वह हुआ इसमें क्या आश्चर्य है इस आशय से कहते हैं । एक देश में स्थित योगी तीनों कालों में सर्वत्र होकर एक ही समय में सब काम करते हैं, सबका अनुभव भी करते हैं