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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 125, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 125, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 125 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

अत्रैव वृषके वर्षे शैले केसरनामनि । केसरित्वं गतः पूर्वः पाश्चात्येनैव मोचितः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

एक ही वस्तु नाना ओर अनाना दोनों हो यह विरुद्ध है, माया द्वारा भी वह नाना ओर अनाना कैसे होगी ? इस पर युक्ति कहनी चाहिये, ऐसा कोई कहे, तो उस पर कहते हैं । यदि नानात्वमात्र का निषेध किया जाय तो यह अनाना (नियत एकरूप ) ही है । यदि नानारूप का निषेध न किया जाय तो नाना भी है ओर अनाना भी है । वास्तव में तो न नाना है और अनानात्व धर्म का भी निषेध होने के कारण न अनाना ही हे । तथा अनानात्व धर्म का निषेध होने से नाना भी हो सकता हे । यही नाना ओर अनाना के अविरोध में युक्ति है