Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 114
एक सौ बारहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ तेरहवाँ सर्ग शत्रुओं के विनाश से विजय के साधनभूत शस्त्रास्त्रं के विनाश तथा समुद्रों के वैभव का विस्तार से वर्णन।
16 verse-groups
- Verses 1–2तदनन्तर इस प्रकार भाग रहे शत्रुओं की सेना का पीछा कर रहे वे चार विपश्चित अत्यन्त दूर चले…
- Verses 3–4नदियों के प्रवाहों की नाई उन्होने दूर से अपनी सेनाओं का निरन्तर शत्रु सेना से सम्पर्क रखत…
- Verse 5दौड़ रहे विपक्षियों की, अपनी और दूसरों की दर्शनीय सेनाएँ मुमुक्षु जनों के पुण्य-पापों की…
- Verse 6इसके उपरान्त जैसे अग्नि की ज्वालाएँ दाह्य वस्तुओं के (लकड़ी आदि के) अभाव से शान्त हो जाती…
- Verse 7तरकस, म्यान आदि अपने निवास गूहों में, रथो, हाथियों और वृक्षों के समूहों मे अस्त्र सायंकाल…
- Verse 8उक्त आयुध, जैसे लहरें जल के अन्दर विलीन हो जाती हैं, जैसे कुहरा बादल मेँ विलीन हो जाता है…
- Verses 9–11शून्यरूपी जल से भरा निर्मल आकाशरूपी एकार्णव प्रलयकाल में प्रसिद्ध एकमात्र अतः विस्तृत साग…
- Verse 12एकार्णव-सा विस्तृत आकाश, जो विस्तृत (फैले हुए) सूर्यप्रकाश से गम्भीर अतएव कान्तियुक्त और…
- Verses 13–15तदुपरान्त उक्त चार विपश्चितो ने आकाश के छोटे भाइयों के सदृश विस्तारयुक्त निर्मल आकारवाले,…
- Verses 16–20उनमें लहरों के खण्डो और कल्लोलो से चारों ओर महान गुड-गुड शब्द हो रहा था, प्रचुर जलकणरूपी…
- Verses 21–26माल से लदे हुए तथा तने हुए पाल पर फर- फर ध्वनि करनेवाले वायुओं के कारण चल रहे जहाजों की क…
- Verses 27–28उन्होने (चार सागरों ने) आकाशरूपी खेत में बहुत से रत्न किरणरूपी अंकुर लगा रक्खे थे, स्वच्छ…
- Verse 29कहीं पर वे इन्द्रनील मणियों के तटों से, जिसमें इधर उधर बिखरी हुई मोतीवाली सैकड़ों सीपें ज…
- Verses 30–34वे रत्नों की किरणराशियों का सन्देह करानेवाली तरंगों मे प्रतिबिम्बित तटभूमि की विकसित ताल…
- Verses 35–40अत्यन्त गम्भीरता, निर्मलता ओर विस्तार के वैभव से अपने में प्रतिबिम्बित आकाश को मानों हृदय…
- Verse 41आकाश तक पहुँचे हुए पर्वतों के शिखरो पर तटों के आगे पूर्ववर्णित रीतियों से तरंगों द्वारा स…