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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 114, Verses 21–26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 114, verses 21–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 114 · श्लोक 21-26

संस्कृत श्लोक

नानादिग्देशपयसामब्धौ साधुसमागमः । यात्रायामिव लोकानां मिथः कलकलान्वितः ॥ २१ ॥ जलेचरावरा नूनं सागरार्णवसंगमे । अन्योन्यवेल्लनाद्युद्धं न कदाचन शाम्यति ॥ २२ ॥ ताम्यत्तिमितरङ्गाग्रनर्तनावर्तविभ्रमम् । वलयन्वायुरायाति वान्तसीकरमौक्तिकैः ॥ २३ ॥ सरिन्मुक्तालतामध्यमध्यस्थाब्दमणीश्वराः । दीर्घाः खणखणायन्ते चञ्चलाः सर्वतोऽम्बुधेः ॥ २४ ॥ महेन्द्राद्रेर्गुहागेहपरावृत्तार्णवाध्वनाम् । भांकारिण्यो भुवः सिद्धसाध्यानां सुसुखावहः ॥ २५ ॥ मन्दरः कन्दरोद्गीर्णैः प्रसरैर्मातरिश्वनः । कम्पाकुलवनाभोगः पुष्पमेघांस्तनोति खे ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

माल से लदे हुए तथा तने हुए पाल पर फर- फर ध्वनि करनेवाले वायुओं के कारण चल रहे जहाजों की कतार ऊपर को उछल रही थी, लहरों में उलझी हुई रत्नराशियों के गिरने के धक्के से उनमें झँकार ध्वनि हो रही थी, विविध जलों से युक्त सेनाओं की बाहुओं द्वारा अनायास सूर्यमण्डल का स्पर्श कर रहे थे (या विविध समुदायों से पूर्ण तरंगरूपी बाहुओं से वे अनायास सूर्यमण्डल का स्पर्श कर रहे थे) ऊपर को छिटक रही किरणों से युक्त मणिमाणिक्यों के समूह उनमें डूब और उतरा रहे थे, फाँदने से फेनवाले आवर्तो में (जलभ्रमियों में) मगरों के झुण्ड के झुण्ड घूम-फिर रहे थे, चक्कर लगा रहे थे, कहीं पर हाथियों (८) रोगाकुल के पक्ष में - साँस रोग से पीडित अतएव चंचलशरीर तथा पीड़ा के मारे बार-बार भुजाओं को ऊपर उठा रहे । (4) संसारपक्ष में छः उर्मियों से (काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से) कुटिल जलाशयं से पूर्ण । के सूँडों को ऊपर करने से वे क्षणभर के लिए बाँस के बन से बनाये जा रहे थे, हाथियों की पूँछ उनमें लहरियों की बौर-सी मालूम पड़ रही थी, हाथियों की पीठरूपी पंक्तियों में सटी हुई फेनराशि से वे पुष्पित बसंत जैसे प्रतीत हो रहे थे । कहींपर (श्वेत द्वीप आदि में ) मालूम पड़ता था कि मानों बसंत अपने परिवार के साथ उनके अन्दर विश्राम कर रहा है, उनके एक स्थान पर असंख्य नाना प्रकार के सुर और असुरों के आवास बने थे, फेन आदिरूप तारों से युक्त नूतन तरंगराशियों से वे आकाश का परिहास कर रहे थे, गुफा में स्थित मच्छर की नाईं पातालरूपी गड में प्रविष्ट होकर बाहर निकलने में भयभीत पर्वत उनमें मूलाशाखा से (जड़ों की शाखा के तुल्य) प्रतीत हो रहे थे, वे अपनी तरंगराशियों से तटवर्ती पर्वतों को छोटे बना रहे थे (तटवर्ती पर्वतों की अपेक्षा तरंग राशियाँ बहुत ऊँची थीं, अतः वे छोटे दिखाई दे रहे थे ।)