Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 114, Verses 30–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 114, verses 30–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 114 · श्लोक 30-34
संस्कृत श्लोक
जलदान्वलयन्वायुरलकालकतां गतान् ।
इत आयाति पुष्पाभ्रं रचयन्वनवीथिषु ॥ ३० ॥
कुन्दमन्दारसंदोहमधुरामोदमन्थरान् ।
तुषारसीकरोन्मिश्रानिवात्र कलयानिलान् ॥ ३१ ॥
नालिकेरलतालास्यलब्धतिक्तसुगन्धयः ।
पतन्ति पवनाः पश्य पारसीकपुरीः पुरा ॥ ३२ ॥
धुन्वानाः पुष्पितेशानवनकर्पूरवारिदान् ।
चालयन्तोऽनिला वान्ति कैलासकमलाकरान् ॥ ३३ ॥
करीन्द्रकुम्भनिष्क्रान्तमदमन्थरमूर्तयः ।
इमे शुकशुकायन्ते विन्ध्यकन्दरवायवः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
वे रत्नों
की किरणराशियों का सन्देह करानेवाली तरंगों मे प्रतिबिम्बित तटभूमि की विकसित ताल की
वनपंक्तियों को तरगों के परिवर्तनं से परिवर्तित कर रहे थे, तीरभूमि के वनों की लताओं से धिरे
हुए इलाइची, लौंग, कंकोलों के फलों को लेने की इच्छा करनेवाले जलजन्तु उनमें बार-बार आ
जा रहे थे, आम, भूकदम्ब, कदम्ब की चोटियों पर बैठे हुए पक्षियों को जिनकी जल में परछाई पड़ी
थी, भक्ष्य मांस आदि के प्रदर्शन के व्याज से लहर के समीप लाकर खा रहे जलजन्तु उनमें चुटकी
बजाने की सी ध्वनि कर रहे थे, नभचर जन्तुओं के प्रतिबिम्ब पड़ने के कारण इधर-उधर दौड रहे
जलजन्तु उनमें प्रति क्षण बड़े-बड़े (पुल) तोड़ रहे थे और बाँध रहे थे । उन्होने चार दिशाओं में
चार समुद्रं को देखा । वे अमूर्त थे किन्तु प्रतिबिम्ब से सारा त्रैलोक्य को हृदय में धारण किये हुए
और आकाश के समान व्यापक नारायण के समान थे