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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 114, Verses 9–11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 114, verses 9–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 114 · श्लोक 9-11

संस्कृत श्लोक

महेन्द्रो मन्द्रगर्जाभिरभिक्षिपति गर्जतः । पर्जन्यानूर्जितो जन्यः प्रतिजन्यान्यथा जडैः ॥ ९ ॥ चन्दनारूषितः श्रीमाञ्जेतुं जलधिवेल्लनाः । समुद्यत इवोच्चोऽसौ मल्लो मलयपर्वतः ॥ १० ॥ सर्वतः कचितोऽजस्रं रत्नवीचिभिरम्बुधिः । भूरत्नवलयभ्रान्त्या प्रेक्ष्यते सूर्यमार्गगैः ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

शून्यरूपी जल से भरा निर्मल आकाशरूपी एकार्णव प्रलयकाल में प्रसिद्ध एकमात्र अतः विस्तृत सागर बन गया, क्योकि उसके अस्त्र-शस्त्ररूपी जल जन्तु मूसलाधार वृष्टि से हुए कीचड़ में विलीन होकर शान्त हो चुके थे, चक्ररूपी सैकड़ों आवर्तो से वह रहित था अतः निर्मल सौम्यता उसमें चारों ओर विराजमान थी, बाणरूपी जलकणों की वेगवती वृष्टि ओर कुहरा उससे हट चुका था, बादलों के घटाटोप से हुई तरगों की भाँति ऊँची ऊँची जलधाराएँ उसमें शान्त हो चुकी थीं, नक्षत्रोरूपी रत्न-राशि अन्दर छिप चुकी थी तथा सूर्यरूपी बडवाग्नि उसके एक देश में स्थित थी