Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 114, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 114, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 114 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथ तेषां तदा तत्र ततस्तांस्तानदर्शयन् ।
पार्श्वगा वनवृक्षाब्धिशैलमेघवनेचरान् ॥ १ ॥
देव पश्यास्य शैलस्य येयमभ्रंकषाग्रभूः ।
समरुन्मध्यदेशादेरश्मदेशमुपेयुषः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर इस प्रकार भाग रहे शत्रुओं की सेना का पीछा कर रहे वे चार विपश्चित अत्यन्त दूर
चले गये । सर्वशक्तिशाली सब देहों में स्थित एक चेतन ईश्वर से दिग्विजय करने के लिए प्रेरित
तुल्य अभिप्रायवाले उन सबों ने दिग्विजय किया
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ बारहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ तेरहवाँ सर्ग शत्रुओं के विनाश से विजय के साधनभूत शस्त्रास्त्रं के विनाश तथा समुद्रों के वैभव का विस्तार से वर्णन।