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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 8

23 verse-groups

  1. Verse 1आठवाँ सर्ग जिस कारण अविद्या की जगद्गूपी विभूतियाँ है उसका पिछले सर्ग में वर्णन करने के अन…
  2. Verse 2यह कार्यअविद्यारूपी लता बड़े-बड़े मेरु आदि पर्वतरूप पर्वो (काण्ड की संधियों) से युक्त, चि…
  3. Verse 3इस अविद्यारूपी लता में प्रतिदिन वृद्धि प्राप्त करनेवाले सुख, दुःख, जन्म, स्थिति, ज्ञान एव…
  4. Verse 4सुख आदि में मूलरूपत्व तथा फलरूपत्व का उपपादन करते हैं। अनुभूयमान सम्पत्ति आदि सुखो से “आग…
  5. Verse 5जन्म से भी अविद्या उत्पन्न होती है ओर वह वाद में जन्मान्तररूप फल प्रदान करती ही हे । जन्म…
  6. Verse 6वह अविद्या अज्ञान से वृद्धि प्राप्त करती है ओर बाद में अज्ञानरूप फल देती ही है । ज्ञान से…
  7. Verse 7प्रसंगप्राप्त विषय का उपपादन कर प्रस्तुत लता का ही वर्णन करते हैं। नानाप्रकार के उल्लासो…
  8. Verse 8“नाना प्रकार के उल्लासो से युक्त है“ इसीका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं। यह लता दिवस समूह…
  9. Verse 9कर्मरूप वायु के द्वारा पुनः-पुनः भ्रमित होकर यह सृष्टिलता कहींपर यानी किसी अधिकारी प्राणी…
  10. Verses 10–11उत्पन्न होनेवाले मित्र, पशु आदि पल्लवो से पूर्ण, उत्पन्न हुए पुत्र, पौत्र आदि अंकुरों से…
  11. Verse 12यह लता “समस्त ऋतुरूपी पुष्यो से शोभित है” ऐसा पहले जो कहा गया है, उसका विवरण करते हैं । प…
  12. Verse 13हे रघुकुल को आनन्द देनेवाले श्रीरामजी, आकाशमण्डल को पूर्ण करनेवाली अर्थात्‌ व्याप्त कर स्…
  13. Verse 14चन्द्र, सूर्य तथा अग्नि के प्रकाश इस लता के उक्त पुष्पसम्बन्धी पराग हैं। इसी पराग से यह,…
  14. Verses 15–22यह लता चित्तरूपी हाथी से प्रकम्पित, संकल्परूप मधुर कलनाद करनेवाली कोकिल से युक्त, इन्द्रि…
  15. Verse 23चुकी है ओर मरनेवाली भी हे । वह आधी कटी हुई है, ओर पूर्णरूप से भी कटी हुई है तथा प्रवाहरूप…
  16. Verse 24वह अतीत काल में थी ओर वर्तमान काल में भी है, वह सर्वदा असत्पदार्थ के सदृश होती हुई भी सत्…
  17. Verse 25यह कार्य अविद्या निश्चय ही महती विषलता है, क्योकि अविचार से इसका आश्लेष यानी सम्बन्ध होने…
  18. Verse 26कार्यअविद्या के स्वरूप का विचार करनेवाले तत्ववित्‌ के प्रकाशमान पूर्ण आत्मा में वह अन्तःव…
  19. Verse 27कहीं तो वह पृथिवीरूपता को प्राप्त हुई है और कहीं द्युलोकरूप से अवस्थित हुई है । उन्होने क…
  20. Verse 28यह सृष्टिरूपी लता कहीं तो तमरूप है, कहीं तेजोरूप है, कहीं आकाशरूप है, कहीं सस्यश्यामला (अ…
  21. Verse 29कहीं पक्षिरूप होकर उडती है, कहीं देवरूप होकर उत्थित होती है, कहीं स्थाणु होकर स्थित है ओर…
  22. Verses 30–31कहीं पर नरकरूप होकर पातालकुहर में विलीन रहती है तो कहीं स्वर्ग में विलास करती है । कहीं द…
  23. Verse 32कहीं विष्णुरूपा है, कहीं ब्रह्मारूपा है, कहीं रुद्ररूपा है, कहीं सूर्यरूपा है, कहीं अग्नि…