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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 8, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 8, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 8 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

विकसन्त्यः प्रतिदिनं चन्द्रार्कावलयोऽभितः । व्योम्नि वातविलोलानि पुष्पाण्यस्याः किल ग्रहाः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

यह लता “समस्त ऋतुरूपी पुष्यो से शोभित है” ऐसा पहले जो कहा गया है, उसका विवरण करते हैं । प्रतिदिन आकाश में चारों ओर से विकसित हो रही चन्द्र, सूर्य आदि के सहित नवग्रहरूप ज्योतियों की जो पंक्तियाँ हे । वे ही इस सृष्टिरूपी लता के वायु से चंचल हुए पुष्प हैं