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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 8, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 8, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 8 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । संसारवनखण्डेऽस्मिंश्चित्पर्वततटे स्थिता । कीदृशी सृष्ट्यविद्याख्या लता विकसिता कदा ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

आठवाँ सर्ग जिस कारण अविद्या की जगद्गूपी विभूतियाँ है उसका पिछले सर्ग में वर्णन करने के अनन्तर कार्य अविद्या का संसाररूपी वन की लता के रूप में वर्णन । सबसे पहले विषय का निर्देश कर वर्णन-प्रकार की प्रशंसा करते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, इस संसाररूपी अरण्य के एकदेश में विद्यमान कूटस्थ चिद्रूप पर्वत के तट में स्थित कार्यअविद्यारूपी लता कब और किस प्रकार विकसित हुई, इसका मैं वर्णन करता हूँ, आप सुनिये