Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 8, Verses 30–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 8, verses 30–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 8 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
क्वचिन्नरकसंलीना क्वचित्स्वर्गविलासिनी ।
क्वचित्सुरपदं प्राप्ता क्वचित्कृमितया स्थिता ॥ ३० ॥
क्वचिद्विष्णुः क्वचिद्ब्रह्मा क्वचिद्रुद्रः क्वचिद्रविः ।
क्वचिदग्निः क्वचिद्वायुः क्वचिच्चन्द्रः क्वचिद्यमः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर नरकरूप होकर पातालकुहर में विलीन रहती है तो
कहीं स्वर्ग में विलास करती है । कहीं देवपद को प्राप्त हुई है, तो कहीं कृमिरूप होकर स्थित हुई
है