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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 13

बारहवाँ सर्ग समाप्त तेरहवाँ सर्ग पहले तत्त्वज्ञान से वासनानाश का प्रकार बतलाने के अनन्तर अब प्राणनिरोधरूप योग से वासना विनाश का प्रकार बतलाने के लिए रची जा रही भूमिका का वर्णन ।

11 verse-groups

  1. Verses 1–2उपशम प्रकरण में दिखलाये गये वासनानाश के हेतुभूत ज्ञान और योग दोनों प्रकारों से उत्तम अधिक…
  2. Verses 3–4प्रश्न का उत्तर कहने के लिए महाराज वस्रिष्ठजी भी उपशम-प्रकरण में कहे गये राजयोग और हठयोग…
  3. Verse 5पहले उन दोनों में कौन-सा प्रकार सरल है“ यों विशेषरूप से श्रीरामजी पूछते हैं। श्रीरामचन्द्…
  4. Verse 6महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामभद्र, यद्यपि शास्त्रों में 'योग” शब्द से उपर्युक्त दोन…
  5. Verse 7संसारसागर से पार उतरने की पद्धति में एक योग अर्थात्‌ प्राणनिरोध और दूसरा ज्ञान-ये दोनों ए…
  6. Verse 8किसी के लिए यानी प्राणनिरोधजन्य दुःख के सहने में असमर्थ सुकुमारचेता, पुरुष के लिए योग- हठ…
  7. Verse 9ज्ञान और अज्ञान के स्वरूप का विवेक करने की सामर्थ्य न रहने पर ही विचार में अप्रता होती है…
  8. Verse 10प्रशस्त देश, काल, विषय आदि बाह्य हेतुओं की अपेक्षा होने से भी योग दुष्कर है, यों कहते है…
  9. Verse 11इस प्रकार अवान्तर प्रश्न का (बीच में आये हुए (कतरः शोभनः” वाले प्रश्न का) निरास कर पहले प…
  10. Verse 12हे साधो, अब आप यह योग सुनिए जो कि प्राण ओर अपान की समतारूप से प्रसिद्ध है, दृढ़ देहरूपी ग…
  11. Verse 13समाधियुख में विश्रान्तिरूप फल के कथन द्वारा भी प्रशंसा कर रहे महर्षि वसिष्ठजी वही योग श्र…