Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 13, Verses 3–4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 13, verses 3–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 13 · श्लोक 3 ,4
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
संसारोत्तरणे युक्तिर्योगशब्देन कथ्यते ।
तां विद्धि द्विप्रकारां त्वं चित्तोपशमधर्मिणीम् ॥ ३ ॥
आत्मज्ञानं प्रकारोऽस्या एकः प्रकटितो भुवि ।
द्वितीयः प्राणसंरोधः श्रृणु योऽयं मयोच्यते ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रश्न का उत्तर कहने के लिए महाराज वस्रिष्ठजी भी उपशम-प्रकरण में कहे गये राजयोग और
हठयोग इन दो प्रकारो का ही स्मरण कराते हुए प्रतिज्ञा करते हैं।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, संसारसागर से पार उतरने में जो उपाय है, वही "योग
शब्द से कहा जाता है, चित्त का विलय करनेवाला वह उपाय दो प्रकार का है, यह आप जानिए | इसका
प्रथम प्रकार आत्मज्ञान है, जो संसार में प्रसिद्ध है और द्वितीय प्रकार प्राणनिरोध है, जिसे मैं कहता हूँ,
(आप सावधान होकर) सुनिए