Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 13, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 13, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 13 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
मुखानिलस्फुरणनिरोधसंभवस्थितिं गतो नृपसुत चेतसाऽक्षये ।
समाहितस्थितिरिह योगयुक्तितः परे पदे प्रगलितगीर्निवत्स्यसि ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
समाधियुख में विश्रान्तिरूप फल के कथन द्वारा भी प्रशंसा कर रहे महर्षि वसिष्ठजी वही योग
श्रीरामचन्द्रजी से कहते है ।
हे राजपुत्र श्रीरामभद्र, प्रयत्नशील चित्त से प्राण-गति के निरोध से होनेवाली निष्ठा को प्राप्त
होकर यदि आप चित्तवृत्ति निरोध के अभ्यास से प्रत्यग्रूप, अक्षय, परमपद में भली प्रकार स्थिरता
प्राप्त कर लेंगे, तो वाणी और मन के अगोचर, निरतिशय-आनन्दस्वरूप होकर आप स्थित रहेंगे