Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 114
एक सौ तेरहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चौदहवाँ सर्ग अनेक दृष्टान्तो से सत् ओर असत् का स्वरूप बतलाकर असद्रूप के निरास द्वारा सद्रूप मेँ स्थिरता का वर्णन ।
7 verse-groups
- Verse 1समस्त जगत् केवल मन का संकल्प-विकल्प ही है, इसलिए निर्विकल्प वैतन्यवस्तु के प्रदर्शन से ह…
- Verses 2–3अभिन्नसत्ता से पख्रह्म में हुई उसकी स्थिति में दरष्टान्त बतलाते है । हे राघव, फूलों मे जस…
- Verses 4–10होती, केवल ज्वालाबुद्धि ही रहती हे
- Verses 11–13कल्पित आकारों से युक्त बुद्धि कल्पित आकारो में ही आस्था बोधकर अनेक तरह की कल्पना करती है,…
- Verses 14–21दृष्टान्त मेँ जो विकल्पत्याग की शैली युक्तिपूर्वक सिद्ध की गई है, उसका दाष्टन्ति में उपदे…
- Verse 22मिथ्या होने से ही जब तत्त्वज्ञान से “जगत् ब्रह्मरूप है, ऐसी भावना की जाती है तब उसका माय…
- Verses 23–30तत््वसाक्षात्कार न होने पर जगत् का क्या स्वरूप रहता है, उसे कहते हैँ । यदि दृश्य जगत् क…