Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 114, Verses 23–30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 114, verses 23–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 114 · श्लोक 23-30

संस्कृत श्लोक

दृश्यं त्वपरमार्थेन प्रयाति शतशाखताम् । जलमूर्मितरङ्गादिकलनार्हं परिस्फुरन् ॥ २३ ॥ यथाम्बुधिर्वपुर्धत्ते स्वभावेन तथा चितः । कुर्वन्कर्मसहस्राणि ह्यणुचित्स्पन्दनादृते ॥ २४ ॥ नापूर्वं कुरुते किंचित्किंचिद्भेदमतस्त्यजन् । गच्छन्श्रृण्वन्स्पृशन्जिघ्रन्वदन्व्यवहरन्स्वपन् ॥ २५ ॥ नापूर्वं विद्यते किंचित्सत्यमित्येव भावयन् । यद्यत्करोषि तद्विद्धि चिन्मात्रममलं ततम् ॥ २६ ॥ ब्रह्म प्रबृंहिताकारं तस्मादन्यन्न विद्यते । पदार्थजाते सर्वस्मिन्संवित्सारमये स्थिते ॥ २७ ॥ संविदेवेदमखिलं जगन्नान्यास्ति कल्पना । संवित्स्फुरणमात्रेऽस्मिञ्जगज्जालकनामनि ॥ २८ ॥ इदमन्यदिदं चान्यदिति मिथ्याग्रहः कुतः । संभवादखिलाकारेष्वेकस्या एव संविदः । संवेद्यमपि नास्त्येव बन्धमोक्षावतः कथम् ॥ २९ ॥ मोक्षोऽयमेष खलु बन्ध इति प्रसह्य चिन्तां निरस्य सकलां विफलाभिमानाम् । मौनी वशी विगतमानमदो महात्मा कुर्वन्स्वकार्यमनहंकृतिरेव तिष्ठ ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

तत््वसाक्षात्कार न होने पर जगत्‌ का क्या स्वरूप रहता है, उसे कहते हैँ । यदि दृश्य जगत्‌ को अपरमार्थतः देखा जाय, तो हजारों शाखा-प्रशाखाओं में विभक्त हो जाता हे । जैसे समुद्र जलरूप ही होता हुआ ऊर्मि, तरंग आदि कल्पनायोग्य रूप का परिग्रहण कर प्रत्यक्ष समुद्रस्वरूप धारण करता हे, वैसे ही हजारों कर्म कर रहा भी पुरुष चिदाभासयुक्त मन के स्पन्दन के बिना कूटस्थ चैतन्य का अपूर्वं कुछ भी विकार आदि नहीं कर सकता, इसलिए आप भी तुच्छतर दृश्यभेद का त्यागकर जाना, सुनना, स्पर्श करना, सूँघना, बोलना, व्यवहार करना, सोना आदि व्यवहार करते हुए भी अभिनव जगद्रूप कुछ सत्य नहीं है, किन्तु पूर्वसिद्ध ब्रह्म ही परमार्थ सत्य है, इस प्रकार की भावना कीजिये और स्थित रहिये । आप जो कुछ करते हैं उसे निर्मल चिन्मात्रस्वरूप ब्रह्म ही जानिये, क्योंकि ब्रह्म ही जगत्‌ के रूप में विवर्तित होकर उपवृंहित (विकसित) है। अतः जगत्‌ उससे भिन्न नहीं है। समस्त पदार्थ जब चैतन्य-साररूप ही स्थित है तब समस्त जगत्‌ संवित्रूप ही है, यह मानना चाहिए, दूसरी कल्पना नहीं है । जगज्जाल के नाम से जब यह केवल संवित्‌ का स्फुरण ही विद्यमान है तब यह दूसरा है, यह उससे भिन्न है, इत्यादि मिथ्याज्ञान कहाँ से उत्पन्न हुआ। जितने आकार हैं उन सबमें एक संवित्‌ का ही अस्तित्व होने से न संवेद्य का अस्तित्व है और न उसके मूल का ही अस्तित्व है, इसलिए बन्ध और मोक्ष ही किस तरह के ? हे श्रीरामजी, यह मोक्ष है, यह बन्ध है इत्यादि समस्त निष्फल अभिमानरूप चिन्ताओं का बलपूर्वक त्यागकर वाक्‌ आदि समस्त इन्द्रियो के ऊपर विजय पाकर मौनी, जितेन्द्रिय तथा मान ओर मद से रहित होकर अपने योग्य राज्य आदि कार्यो को करते हुए अहंकाररहित आप महात्मा ही बनकर स्थित रहिये