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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 114, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 114, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 114 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । परस्माद्ब्रह्मणः पूर्वं मनः प्रथममुत्थितम् । मननात्मकमाभोगि तत्स्थमेव स्थितिं गतम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

समस्त जगत्‌ केवल मन का संकल्प-विकल्प ही है, इसलिए निर्विकल्प वैतन्यवस्तु के प्रदर्शन से ही उसका निरास सुलभ है, यह समझाने के लिए पहले पख्रह्म मेँ मन की कल्पना कहते हैँ । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे राघव, सृष्टि के आदिकाल में समस्त कल्पनाओं से पहले संकल्प-विकल्पात्मक इस विशाल जगत्‌ की रचना में समर्थ मन उत्पन्न हुआ | वह तभी से उस परब्रह्म मेँ अभिन्न सत्ता से स्थित हुआ ही अनेक भिन्न-भिन्न कल्पनाओं का निमित्त बनकर आज तक विद्यमान हे

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ तेरहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चौदहवाँ सर्ग अनेक दृष्टान्तो से सत्‌ ओर असत्‌ का स्वरूप बतलाकर असद्रूप के निरास द्वारा सद्रूप मेँ स्थिरता का वर्णन ।