Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 114, Verses 11–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 114, verses 11–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 114 · श्लोक 11-13

संस्कृत श्लोक

ज्वालाजालाभ्रलेखेव रञ्जिता सा तथा स्थितिः । तामेवास्थां समादत्ते तद्गतान्याकुला मतिः ॥ ११ ॥ पावकाव्यतिरेकेण ज्वालाली येन भाव्यते । तस्याग्निबुद्धिरेकास्ति निर्विकल्पः स उच्यते ॥ १२ ॥ यो निर्विकल्पः सुमहान्सोऽसंक्षीणमहामतिः । प्राप्तव्यं तेन संप्राप्तं नासौ वस्तुषु मज्जति ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

कल्पित आकारों से युक्त बुद्धि कल्पित आकारो में ही आस्था बोधकर अनेक तरह की कल्पना करती है, यह कहते है । अभ्रपंक्ति के सदुश ज्वालापंक्ति के आकार को प्राप्त हुई उक्त बुद्धिवृत्ति ज्वाला मेँ आस्था बाँधती है, ज्वालापंक्ति में स्थित चलन, ऊर्ध्वगमन आदि की कल्पना करती है तथा व्याकुल हो जाती है। ज्वाला की पंक्ति अग्नि से भिन्न नहीं हे, इस तरह की जो भावना करता है उसको केवल अग्निबुद्धि ही रहती है ओर वह निर्विकल्प कहा जाता हे । जो पुरुष निर्विकल्प यानी ग्राह्य और ग्राहक की द्विधा से निर्मुक्त हो जाता है वही महान्‌ है । उसकी आत्मबुद्धि कभी क्षीण नहीं होती । इस जगत्‌ में प्राप्त करने के योग्य जो कुछ भी है, वह सब उसने प्राप्त कर लिया । वह इन मन के विकल्पों से जनित पदार्थो में सत्यत्वबुद्धि से कभी नहीं फेसता