Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 114, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 114, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 114 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
यथाभूतार्थभावित्वात्तदेतत्प्रविलीयते ।
परमार्थेन दृष्टं चेत्तदिदं नैव किंचन ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
मिथ्या होने से ही जब तत्त्वज्ञान से “जगत् ब्रह्मरूप है, ऐसी भावना की जाती है तब उसका
मायिक रूप नष्ट हो जाता है, यह कहते है।
जगत् परब्रह्मस्वरूप हे, इस प्रकार की भावना करने पर प्रसिद्ध यह जगत् विलीन हो जाता हे ।
परमार्थतः जगत् यदि देखा जाय, तो कुछ भी नहीं हे