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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 113

एक सौ बारहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ तेरहवाँ सर्ग “मिथ्यापुरुष” शब्द आदि का अर्थ और उक्त आख्यायिका का साम्यवर्णन द्वारा तात्पर्य -कथन |

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  1. Verses 1–4श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे प्रभो, मिथ्यापुरुष के प्रसंग से आपने जिस मायामय पुरुष का कथन…
  2. Verses 5–8क्या अधिष्ठानरहित मायाकाश से यह जगत्‌ उत्पन्न होकर उसमें स्थित है 2 नहीं, ऐसा कहते हैं। भ…
  3. Verses 9–12क्रियाओं के कारण पड़े हुए ये यौगिक नाम आप सुनिए | (~) जीव, बुद्धि, मन, चित्त, माया, प्रकृ…
  4. Verses 13–20तस्मादन्यं न तत्राऽस्ति" यह जो पूर्व सर्ग में कहा गया है उसे अनुभव पर चढ़ाते हैं । पूर्णा…
  5. Verse 21पूर्व सर्ग में वर्णित मिथ्यापुरुषरूप अहंकार का परित्याग कराते हुए श्रीवसिष्ठजी आखिर में ब…