Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 113, Verses 5–8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 113, verses 5–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 113 · श्लोक 5-8
संस्कृत श्लोक
अन्तःस्थितसुदुर्लक्ष्यब्रह्म व्योम्नोऽथ शब्दवत् ।
तस्मादुदेत्यहंकारः पूर्वं स्पन्द इवानिलात् ॥ ५ ॥
वृद्धिं यातः स गगने कल्पयत्यात्मतां गतः ।
अनात्मात्माभिधानेन तेनासौ यतते ततः ॥ ६ ॥
अनात्मात्मैकरक्षार्थं देहान्नानाविधानसौ ।
भूयोभूयो विनाशेऽपि सृजत्याकुलतां गतः ॥ ७ ॥
स एव मायापुरुषो मिथ्यापुरुष एव सः ।
असदेवोदितो व्यर्थोऽप्यहंकारो हि मायया ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
क्या अधिष्ठानरहित मायाकाश से यह जगत् उत्पन्न होकर उसमें स्थित है 2 नहीं, ऐसा कहते हैं।
भद्र, उस मायाकाश के अन्दर पामरो से अत्यन्त अगम्य परमब्रह्म अधिष्ठान रूप से विराजित
है और आकाश से शब्द की नाई उस ब्रह्मरूप अधिष्ठानवाले मायारूप आकाश से सबसे पहले
अहंकार का ऐसे उदय होता है, जैसे वायु से सबसे पहले स्पन्दन का उदय होता है । वास्तव मेँ
अहंकार आत्मा तो है नहीं, परन्तु भ्रान्ति से स्वयं अपने को आत्मा ही समझकर अपने कारणभूत
मायाकाश में बढ़ जाता है ओर अनेक संकल्पविकल्पों से किसीको इष्ट ओर किसीको अनिष्ट मानने
लगता है । तदनन्तर उसी कल्पित “अहम्” इस अपने अभिधान से यह इष्ट वस्तु की प्राप्ति ओर
अनिष्ट के परिहार के लिए सतत प्रयत्न करता-रहता हे । अनात्मा होते हुए भी आत्मा की रक्षा करने
में व्याकुलमति हुआ यह अहंकार पूर्व -पूर्वं शरीरो का नाश हो जाने पर उत्तरोत्तर काम, कर्म तथा
वासना के अनुसार बार-बार अनेक तरह के शरीरो की रचना किया करता है । वह अहंकार ही
पूर्वोक्त कथा का मायापुरुष है और वही मिथ्यापुरुष है, क्योंकि माया से जो अहंकार उत्पन्न हुआ
है, वह असूत एवं मिथ्यारूप ही हे