Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 113, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 113, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 113 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
सर्वापदां निलयमध्रुवमस्वतन्त्रमासन्नपातमविवेकमनार्यमज्ञम् ।
बोधादहंकृतिपदं सकलं विमुच्य शेषे सुबद्धपदमुत्तमतां प्रयासि ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्व सर्ग में वर्णित मिथ्यापुरुषरूप अहंकार का परित्याग कराते हुए श्रीवसिष्ठजी आखिर में बचे
हुए चैतन्यमात्र में आप स्थिर हो जाइये, इस तरह के उपदेश के साथ-साथ उपसंहार करते हैं।
(७) प्राणधारण से जीव, बाह्य अर्थो के निश्चय से बुद्धि, उनके मनन से मन, उनके चिन्तन से
चित्त, असत्कल्पना से माया, परिणामी स्वभाव से प्रकृति, संकल्पन से संकल्प, संकल्पित अर्थ के
आकलन से कलन, संकल्पित अर्थ के विपरिणाम आदि में हेतु होने से काल तथा उसमें एकदेशरूप
भेद की कल्पना से कला ~ यों तत्-तत् क्रियाभेद के कारण अहंकार के ये नाम पड़ हैं, वह जान
लेना चाहिए |
(५) काम, संकल्प, विचिकित्सा आदि श्रुति-स्मृति प्रसिद्ध नामों से ।
हे श्रीरामजी, सम्पूर्ण आपत्तियों के आधार, चंचल, परतंत्रता के उत्पादक, तत्क्षण ही नरक में
गिरानेवाले विवेक के शत्रु, निन्द्य, अज्ञान से भरे अहंकार स्थान को देह, इन्द्रिय आदि कलाओं के
साथ-साथ तत्त्वज्ञान से मूलोच्छेदपूर्वक छोड़कर यदि आप अवशिष्ट विशुद्ध चिन्मात्रस्वरूप में
दृढ़तापूर्वक स्थित हो जायेंगे, तो सबसे उत्तमता प्राप्त करेंगे