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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 113, Verses 9–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 113, verses 9–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 113 · श्लोक 9-12

संस्कृत श्लोक

कूपकुण्डचतुःशालकुम्भादीन्देहकानसौ । कृत्वा रक्षित आत्मेति याति तद्व्योम्नि भावनम् ॥ ९ ॥ अहंकारस्य तस्यास्य नामानीमानि राघव । श्रृणु यैर्जगदाकारविभ्रमैर्मोहयत्यसौ ॥ १० ॥ जीवो बुद्धिर्मनश्चित्तं माया प्रकृतिरित्यपि । संकल्पः कलना कालः कला चेत्यपि विश्रुतैः ॥ ११ ॥ एवमाद्यैस्तथान्यैश्च नामभिर्बहुतां गतैः । सहस्ररूपोऽहंकारः कल्पितार्थैर्विजृम्भते ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

क्रियाओं के कारण पड़े हुए ये यौगिक नाम आप सुनिए | (~) जीव, बुद्धि, मन, चित्त, माया, प्रकृति संकल्प (%) तथा कलना, काल और कला इत्यादि प्रसिद्ध नामों से एवं दूसरे भी अनेक नामों से हजारों रूपों को धारण किया हुआ अहंकार कल्पित अर्थो को लेकर इस संसार में अपनी धाक जमाकर अवस्थित है