Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 113, Verses 1–4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 113, verses 1–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 113 · श्लोक 1-4
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
मिथ्यानरप्रसङ्गेन किं मायापुरुषः प्रभो ।
कथितोऽयं त्वया व्योमरक्षण च किमुच्यते ॥ १ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
श्रृणु राम यथाभूतमेतत्प्रकटयामि ते ।
मिथ्यापुरुषवृत्तान्तकथा या कथिताधुना ॥ २ ॥
मायायन्त्रमयः प्रोक्तो यः पुमान्रघुनन्दन ।
एनं त्वं तमहंकारं विद्धि शून्याम्बरोत्थितम् ॥ ३ ॥
यस्मिन्नाकाशकोशेऽस्मिन्साधो जगदिदं स्थितम् ।
तदनन्तमसच्छून्यं सर्गादौ भवति स्वयम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे प्रभो, मिथ्यापुरुष के प्रसंग से आपने जिस मायामय पुरुष का कथन
किया, वह किस अभिप्राय से किया है और उसके द्वारा किये आकाशरक्षण का भी क्या अभिप्राय है, यह
मुझसे कहिए । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, सुनिए, अभी जो मैंने मिथ्यापुरुष की कथा
आपसे कही है, उसका असली तात्पर्य आपसे प्रकट करता हू । हे रघुनन्दन, मेने मायायन्त्रमय जिस
पुरुष का उस कथा में उल्लेख किया है, इसे आप अहंकार ही जानिए, वही मायारूप आकाश में उत्पन्न
हुआ हे । हे साधो, जिस इस मायामय आकाश के एक कोने में यह जगत् अवस्थित है, वह स्वयं सृष्टि
के पहले भी असीम, असत् ओर शून्यरूप ही रहता हे
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ बारहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ तेरहवाँ सर्ग “मिथ्यापुरुष” शब्द आदि का अर्थ और उक्त आख्यायिका का साम्यवर्णन द्वारा तात्पर्य -कथन |