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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 113, Verses 13–20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 113, verses 13–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 113 · श्लोक 13-20

संस्कृत श्लोक

भूताकाशे तते शून्ये जगन्निर्भित्ति निश्चितम् । सुखदुःखान्यनुभवन्मिथ्यैव पुरुषः स्थितः ॥ १३ ॥ यथैव मिथ्यापुरुषो रक्षन्व्योमात्मशङ्कया । घटाकाशादिषु क्लिष्ट एवं मा क्लेशवान्भव ॥ १४ ॥ आकाशादपि विस्तीर्णः शुद्धः सूक्ष्मः शिवः शुभः । य आत्मा स कथं केन गृह्यते रक्ष्यतेऽथवा ॥ १५ ॥ हृदयाकाशमात्रस्य शरीरक्षयसंक्षये । व्यर्थं भूतानि शोचन्ति नष्ट आत्मेति शङ्कया ॥ १६ ॥ घटादिषु प्रणष्टेषु यथाकाशाद्यखण्डितम् । तथा देहेषु नष्टेषु देही नित्यमलेपकः ॥ १७ ॥ शुद्धश्चिन्मात्र आत्मायमाकाशादप्यणोरणुः । स्वानुभूत्यंशमात्रं हि खवद्राम न नश्यति ॥ १८ ॥ न जायते न म्रियते क्वचित्किंचित्कदाचन । जगद्विवर्तरूपेण केवलं ब्रह्म जृम्भते ॥ १९ ॥ सत्यमेकं पदं शान्तमादिमध्यान्तवर्जितम् । भावाभावविनिर्मुक्तमिति मत्वा सुखी भव ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

तस्मादन्यं न तत्राऽस्ति" यह जो पूर्व सर्ग में कहा गया है उसे अनुभव पर चढ़ाते हैं । पूर्णात्मा परब्रह्म में अपने से ही सर्व प्रथम शून्यस्वरूप भूताकाश जब विस्तृत हुआ है, तब उसमें वायु आदि की कल्पनाओं से कल्पित हुआ जगत्‌ युक्तिपूर्वक विचार करने से गन्धर्वनगर के सदृश दीवार आदि आवरण से शून्य ही निश्चित होता हे । छिद्ररहित ब्रह्म से ब्रह्म मेँ छिद्ररूप आकाश की पहले उत्पत्ति नहीं हो सकती । शून्यस्वरूप अतिविस्तृत अचल आकाश तदनन्तर चलनात्मा वायु केसे हो सकता है ? नीरूप अनुष्ण वायु भी स्वविरुद्ध तेजोरूप कैसे हो सकती हे ? दाहस्वभाव उष्ण तेज स्वविरुद्ध जलस्वरूप कैसे हो सकता हे ? एवं जल भी कठिन पृथिवीरूप कैसे हो सकता है ? इन सब बातों से यही निष्कर्ष निकलता है कि वास्तव में इस जगत्‌ की कोई नींव है ही नहीं । उसीमें वह पुरूष मिथ्या ही सुखदुःख का अनुभव करता हुआ स्थित था । श्रीरामजी, जिस तरह आकाश में आत्मबुद्धि की शंका से आकाश की रक्षा करते हुए उस मिथ्यापुरुष ने घट आदि का निर्माण कर उनके आकाशो का रक्षण करने में अनेक तरह के क्लेशो का अनुभव किया, उस तरह आप क्लेशो का अनुभव न कीजिये। भद्र, जो आत्मा है वह तो आकाश से भी बड़ा है, परमशुद्ध है, अत्यन्त सूक्ष्म है, परम कल्याणरूप तथा शुभ है । उसको कौन पकड़ सकता है और कौन उसकी रक्षा कर सकता है ? जब इस शरीररूप आश्रय का विनाश हो जाता है, तब आत्मा नष्ट हो गया, इस शंका से केवल हृदयाकाश के लिए ये प्राणी निरर्थक शोक किया करते हैं। जैसे घट आदि के विनष्ट हो जाने पर घटादि का आकाश कभी नष्ट नहीं होता वैसे ही देहों के नष्ट हो जाने पर देही का यानी देहउपलक्षित आत्मा का कभी विनाश नहीं होता। हे रामजी, चूँकि यह आत्मा शुद्ध चैतन्यरूप आकाश और अणु से भी सूक्ष्म तथा अहंकार से निर्मुक्त केवल स्वप्रकाश चित्‌ ही है, इसलिए आकाश के समान उसका नाश नहीं होता । कहीं किसी समय न कुछ उत्पन्न होता है और न मरता ही है, केवल जगदात्मक विवर्तरूप से वह ब्रह्म ही चमकता हे । श्रीरामजी, आत्मा सत्यरूप है, एक है, प्राप्य स्थान है, शान्त है, आदि मध्य और अन्त से निर्मुक्त है तथा सत्ता ओर असत्ता से रहित है, ऐसा निश्चय कर परम सुखी हो जाइये