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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 109

एक सौ आठवाँ सर्ग समाप्त एक नोौवाँ एक यौ नौं सर्ग बार बार देखकर और ध्यान से सब कुछ जानकर अत्यन्त आश्चर्यचकित और सन्तुष्ट हुए राजा का प्रशंसापूर्वक चूडाला को आलिंगन करना और रात्रि बिताना ।

7 verse-groups

  1. Verses 1–10महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामजी, तदनन्तर अपनी पहले की भार्या देखकर आश्चर्य के मार…
  2. Verses 11–21राज्यत्याग से लेकर वर्तमान क्षणपर्यन्त हुई यावत्‌ घटनाओं का साक्षात्कार कर लेने के बाद रा…
  3. Verses 22–28हे कृशांगि, अरुन्धती, इन्द्राणी, गौरी, गायत्री, लक्ष्मी, सरस्वती आदि बड़ी-बड़ी पुण्यस्त्र…
  4. Verses 29–50निरीह और कृतकृत्य तुम्हारा प्रत्युपकार करने में मैं असमर्थ हूँ, यों राजा कहते हैं। सब प्र…
  5. Verses 51–60उसीका विस्तार पूर्वक वर्णन करते है। मुझे किसी विषय की इच्छा नहीं है, मेरा कोई अंश नहीं हे…
  6. Verse 61तस्मादाद्यन्तमध्येषु” इस उक्ति के अथन्तिर की भी संभावना कर रहे राजा शिखिध्वज जिज्ञासु होक…
  7. Verses 62–76राजा के अभिप्राय के अनुसार ही चूडाला भी उस उक्ति का अर्थ कहती है। चूडाला ने कहा : हे राजश…