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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 109, Verses 1–10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 109, verses 1–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 109 · श्लोक 1-10

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अथ तां दयितां दृष्ट्वा विस्मयोत्फुल्ललोचनः । शिखिध्वज उवाचेदमाश्चर्याकुलया गिरा ॥ १ ॥ का त्वमुत्पलपत्राक्षि कुतः प्राप्तासि सुन्दरि । किमिहासि कियत्कालं किमर्थमिह तिष्ठसि ॥ २ ॥ अङ्गेन व्यवहारेण स्मितेनानुनयेन च । मम जायाविलासेन तत्कलेवोपलक्ष्यसे ॥ ३ ॥ चूडालोवाच । एवमेव प्रभो विद्धि चूडालास्मि न संशयः । अकृत्रिमेण देहेन लब्धोऽस्यद्य मया स्वयम् ॥ ४ ॥ कुम्भादिदेहनिर्माणैस्त्वां बोधयितुमेव मे । प्रपञ्चः शतशाखत्वमिह यातो वनान्तरे ॥ ५ ॥ यदा राज्यं परित्यज्य मोहेन तपसे वनम् । त्वमागास्तत्प्रभृत्येव त्वद्बोधायाहमुद्यता ॥ ६ ॥ अनेन कुम्भदेहेन मयैव त्वं विबोधितः । कुम्भादिदेहनिर्माणं त्वां बोधयितुमेव मे ॥ ७ ॥ मायया न तु कुम्भादि किंचित्सत्यं महीपते । अथो विदितवेद्यस्त्वं ध्यानेनैतदखण्डितम् ॥ ८ ॥ सर्वं पश्यसि तत्त्वज्ञ ध्यानेनाश्ववलोकय । अथ चूडालयेत्युक्तो बद्ध्वा परिकरं नृपः ॥ ९ ॥ आत्मोदन्तं विशेषेण ध्यानेनामलमैक्षत । अभिराज्यपरित्यागाच्चूडालादर्शनावधि ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामजी, तदनन्तर अपनी पहले की भार्या देखकर आश्चर्य के मारे राजा शिखिध्वज के नेत्र विकसित हो गये और वह विस्मययुक्त वाणी से यह कहने लगे : कमल के पत्तों के समान विशाल नेत्रवाली हे सुन्दरि, तुम कौन हो, कहाँ से आई हो, क्या तुम ही कुम्भ आदि का रूप धारण कर यहाँ रहती हो, कितने समय तक यहाँ रहोगी और मेरे पास आने का क्या प्रयोजन है ? हे सुन्दरि, अवयवों के गठन से, उनकी चेष्टाओं से, स्मित से, प्रेमभरी वाणी बोलने की शैली से और मेरी भार्या के जैसे तुम्हारे विलास से तुम चूडाला की मूर्ति के ही सदृश दिखाई दे रही हो । चूडाला ने कहा : प्रभो, हाँ ऐसा ही जानिए, मैं बिना किसी संशय से चूडाला ही हू । स्वाभाविक शरीर से ही मैंने आज आपकी प्राप्ति की है। महाराज, इस अरण्य में कुम्भ आदि के शरीरो के निर्माण द्वारा मेरा जो माया प्रपंच सैकड़ों शाखा-प्रशाखाओं के रूप में आपके सामने आया, वह केवल आपको बोध देने के लिए ही मैंने रचा था । मोहवश राज्य छोड़कर जबसे तप के लिए वन में आप आये, तभी से मैं आपको ज्ञान देने के लिए प्रयत्नशील रही । राजन्‌, इस कुम्भ के शरीर से मैंने ही आपको बोधित किया है। मैंने माया से जिन कुम्भ आदि शरीरो का निर्माण किया था, वह केवल आपको ज्ञान देने के लिए ही था। वास्तव में कुम्भ आदि कुछ भी सत्य नहीं थे। हे महाराज, अब तो आप ज्ञेय वस्तु को जान चुके हैं, इसलिए आप पूर्वोक्त योग-धारणा से अविकल सब देख लेंगे । हे तत्त्वज्ञ, आप शीघ्र ही ध्यान लगाकर देखिए । जब चूडाला ने वैसा राजा से कहा तब योगधारणा के अनुकूल आसन बाँधकर ध्यान से अपना विशेष सब हाल अच्छी तरह से जान लिया। राज्यपरित्याग से लेकर चूडाला के साक्षात्कार तक जितनी अपने लिए घटनाएँ घटीं थीं, उन सबका राजा ने मुहूर्तमात्र के ध्यान से प्रत्यक्षतः ज्ञान कर लिया

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ आठवाँ सर्ग समाप्त एक नोौवाँ एक यौ नौं सर्ग बार बार देखकर और ध्यान से सब कुछ जानकर अत्यन्त आश्चर्यचकित और सन्तुष्ट हुए राजा का प्रशंसापूर्वक चूडाला को आलिंगन करना और रात्रि बिताना ।