Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 109, Verses 51–60
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 109, verses 51–60 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 109 · श्लोक 51-60
संस्कृत श्लोक
सर्वातीतः सर्वगश्च खमिवायमहं स्थितः ।
चूडालोवाच ।
एवं स्थिते महासत्त्व प्राणेश हृदयप्रिय ॥ ५१ ॥
किमिदानीं प्रभो ब्रूहि रोचते ते महामते ।
शिखिध्वज उवाच ।
प्रतिषेधं न जानामि न जानाम्यभिवाञ्छितम् ॥ ५२ ॥
यदाचरसि तन्वि त्वं कदाचिद्वेद्मि तत्तथा ।
यद्यन्मतं ते सकलं तथास्त्वविकलं प्रिये ॥ ५३ ॥
न किंचिदनुसंधातुं जानाम्यम्बरसुन्दरः ।
यदेव किंचिज्जानासि तदेव कुरु सुन्दरि ॥ ५४ ॥
तदेव धारयिष्यामि प्रतिबिम्बं यथा मणिः ।
चेतसा गलितेष्टेन यथाप्राप्तमनिन्दितम् ॥ ५५ ॥
न स्तौमि न च निन्दामि यदिच्छसि तदाचर ।
चूडालोवाच ।
यद्येवं तन्महाबाहो समाकर्णय मन्मतम् ॥ ५६ ॥
आकर्ण्य जीवन्मुक्तात्मस्तदेवाहर्तुमर्हसि ।
सर्वत्रैक्यावबोधेन मौर्ख्यक्षयभुवान्विताः ॥ ५७ ॥
निरिच्छास्तावदाकाशविशदाः संस्थिता वयम् ।
यादृगेषणमस्माकं तादृशं तदनेषणम् ॥ ५८ ॥
यत्प्राणानैषणे कोऽत्र चिन्मात्रोऽभ्यसते हि कः ।
तस्मादाद्यन्तमध्येषु ये वयं पुरुषोत्तम ॥ ५९ ॥
शेषमेकं परित्यज्य त एवेमे स्थिता वयम् ।
राज्येन सांप्रतेनेमं कालं नीत्वा क्रमेण वै ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
उसीका विस्तार पूर्वक वर्णन करते है।
मुझे किसी विषय की इच्छा नहीं है, मेरा कोई अंश नहीं हे, मे आकाश के सदृश अत्यन्त निर्मल हूँ,
निस्पृह हूँ, शान्त हूँ, परमार्थ सत्स्वरूप हूँ, देह आदि में अहंभाव का भ्रम छोडकर, बहुत काल बीत जाने
के पीछे, वास्तव में, मैं जिस रूप का था, उस रूप का ही बनकर अब स्थित हू । आत्मा में निरन्तर
आसक्त हुए चित्तपर ही मे अवलम्बित रहता हूँ, इसलिए मैंने वह अलौकिक आनन्ददशा प्राप्त कर ली
है, जिससे कि हजारों प्रयत्नो से हरि, हर आदि महामहिमशाली देवता भी मुझे अलग नहीं कर सकते।
हे भ्रमरलोचने, समस्त परिच्छेदों से निर्मुक्त यानी परिपूर्ण विशुद्ध चिन्मात्र आत्मा में मैं स्थित हो गया
हूँ, मैं अब अपने वास्तवरूप में स्थित होकर बैठा हूँ ओर संसाररूपी भ्रम से एकदम अलग हो गया हूँ। हे
सुन्दरि, न तो मैं तुष्ट हुँ, न खिन्न हूँ, न कार्य हूँ, न कारण हूँ, न स्थूल हूँ और न सूक्ष्म हूँ, किन्तु मैं
केवल अबाधित (जिसका किसी काल में वाध नहीं होता) वस्तु ही हू । हे चूडाले, सूर्यविम्ब से निकले
हुए तथा भीत पर न गिरे हुए यानी केवल आकाश में फैले हुए, क्षय ओर अतिशय से रहित विशुद्ध प्रकाश
के समान अब मैं बन गया हू । हे पतिव्रते, मैं शान्त हूँ, जगत् का वैषम्य निकालकर साम्य प्राप्त किये हूँ,
स्वरूपनिष्ठ हूँ, बिना मन का हूँ, व्यापक मोक्ष भी मैं हूँ और सम हूँ। तरंग के सदश चंचल कटाक्षवाली
हे प्रिये, जो "तत् वस्तु है, वही मैं हूँ, अब दूसरा कुछ नहीं कह सकता हूँ, तुम मेरी गुरु हो, तुम्हे मैं
नमस्कार करता हूँ । विशाल नेत्रवाली तुम्हारे प्रसाद से ही मेँ भवसागर से पार उतर गया । अब मैं, अग्नि
में सौ वार शुद्ध किये गये सोने के सदृश फिर मल ग्रहण नहीं कर सकता । शान्त, स्वस्थ, कोमल,
स्वरूपस्थिति में अत्यन्त उद्योगी, वीतराग, वासनाशून्य अन्तःकरण से युक्त, सबसे परे ओर सर्वव्यापक
होकर, आकाश की नाई, यह मैं तुम्हारे सामने अवस्थित हू ।४२-५०॥
चूडाला ने कहा : हे महासत्त्व, हे प्राणेश, हे हृदयप्रिय, हे प्रभो, हे महामते, जब कि आप उस प्रकार
की स्थिति में स्थित हैं तब अब आपको क्या रूचता हे, कहिए । शिखिध्वज ने कहा : हे तन्वि, यह
अच्छा नहीं लगता, इस प्रकार जिस वस्तु का निरादर किया जाता है, उस वस्तु को मेँ नहीं जानता ओर
यह अभीष्ट है, इस प्रकार जिस वस्तु की चाहना की जाती है उसे भी मे नहीं जानता। तुम जिस तरह से
जो आचरण करती हो, व्युत्थानकाल में उसे मैं उसी तरह का जानता हू । हे प्रिये, जो जो वस्तु जिस
तरह से तुम्हें अभिमत है, वह सब उसी तरह की अविकलरूप से रहे । मैं तो आकाश के सदृश निर्लेप,
उदासीनता ओर पूर्णतारूप सौन्दर्य से युक्त हो गया हूँ, इसलिए किसी भी वस्तु का अनुसन्धान करना
नहीं जानता। हे सुन्दरि, जो ही कुछ तुम कर्तव्यरूप से जानती हो, उसीको तुम करो। मैं भी मणि जिस
तरह अपने भीतर प्रतिबिम्ब धारण करता है उसी तरह उसे अपने हृदय में धारण करूँगा । इच्छा,
अनिच्छा और उनके विषयों से निर्मुक्त चित्त के कारण मैं प्रारब्धप्राप्त अनिन्दित या निन्दित वस्तु की
न स्तुति करता हूँ और न निन्दा ही करता हूँ, इसलिए तुम जैसा चाहो वैसा करो । चूडाला ने कहा : हे
महाबाहो, यदि ऐसी बात है, तो पहले आप मेरा मत सुनिये और हे जीवन्मुक्तस्वरूप, सुनने के अनन्तर
उसीका आप आचरण कीजिये। महाराज, अज्ञान का विनाश करनेवाले सर्वत्र अद्वैतबोध से सम्पन्न हम
लोग सभी तरह की इच्छाओं से निर्मुक्त ओर आकाश के सदृश विशद होकर अवस्थित हो गये हैं । हे
राजन्, हम लोगों के लिए जैसी अनुपकारक राज्यभोगादि की अपेक्षा है वैसी ही अनुपकारक उनकी
उपेक्षा भी है, क्योकि चक्षु आदि बाह्यन्द्रिय ओर मुख्य प्राण अपने-अपने उचित विषयों की यदि अनिच्छा
करें, तो उससे आत्मा में कौन-सा उपकार होगा ? ज्ञानियों को अज्ञानियों की तरह देहादि-अध्यास
तो है नहीं, जिससे कि विषयोपभोग से देहादि के मलिन हो जानेपर आत्मा भी मलिन हो जाय । जो
तत्त्ववित् है वह तो निष्क्रिय असंग चिन्मात्रस्वरूप ही है, इसलिए ऐसा कोन तत्त्वज्ञानी होगा, जो
विषयोपभोगों का अभ्यास करेगा । इसलिए हे पुरुषोत्तम, प्रारब्ध के केवल उपभोग से आत्मा में मलिनता
की प्राप्ति न होने के कारण प्रारब्धभोग के आरम्भ में, अन्त में और मध्य में हम लोग जिस स्वभाव के हैं,
उसी स्वभाव के होकर केवल अवशिष्ट प्रारब्ध का भोग से विनाशकर स्थित रहें, इससे न तो हम
विपरीत हो जायेंगे और न दूसरे ही बन जायेंगे । हे प्रभो, वर्तमान समय में यह जो अपना अवशिष्ट
आयुकाल है, उसको राज्यभोग से बिताकर क्रमश: कुछ समय के बाद हम लोग विदेहमुक्त हो
जायेंगे