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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 109, Verses 22–28

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 109, verses 22–28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 109 · श्लोक 22-28

संस्कृत श्लोक

उत्तारितो यया बुद्ध्या सा हि केनोपमीयते । अरुन्धती शची गौरी गायत्री श्रीः सरस्वती ॥ २२ ॥ समस्ताः पेलवायन्ते तव तन्व्या गुणश्रिया । धीः श्रीः कान्तिः क्षमा मैत्री करुणाद्यास्तु सुन्दरि ॥ २३ ॥ कान्तास्वाकारकान्तासु प्रथमेवाभिलक्ष्यसे । परेणाध्यवसायेन त्वयाहमवबोधितः ॥ २४ ॥ केन प्रत्युपकारेण परितुष्यति ते मनः । मोहादनादिगहनादनन्तगहनादपि ॥ २५ ॥ पतितं व्यवसायिन्यस्तारयन्ति कुलस्त्रियः । शास्त्रार्थगुरुमन्त्रादि तथा नोत्तारणक्षमम् ॥ २६ ॥ यथैताः स्नेहशालिन्यो भर्तृणां कुलयोषितः । सखा भ्राता सुहृद्भृत्यो गुरुर्मित्रं धने सुखम् ॥ २७ ॥ शास्त्रमायतनं दासः सर्वम भर्तुः कुलाङ्गनाः । सर्वदा सर्वयत्नेन पूजनीयाः कुलाङ्गनाः ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

हे कृशांगि, अरुन्धती, इन्द्राणी, गौरी, गायत्री, लक्ष्मी, सरस्वती आदि बड़ी-बड़ी पुण्यस्त्रियाँ कोमल अंगवाली तुम्हारी गुणसम्पत्ति से सब नीचे ही हैं। हे सुन्दरि, स्त्रियों में अपने अलौकिक सौन्दर्य के कारण प्रसिद्ध हुई जो धी, श्री, कान्ति, क्षमा, मैत्री, करूणा आदि सर्वोत्तम दक्ष कन्याएँ हैं, उनमें भी तुम, सती की नाई, सर्वप्रथम ही मालूम हो रही हो । बड़ा भारी सतत प्रयत्न करके जो तुमने अलौकिक बोध देकर मेरा उपकार किया है, उसके लिए किस प्रत्युपकार से तुम्हारा मन सन्तुष्ट होगा। तुम कृतार्थ हो चुकी हो, तुम्हारा मन जिस प्रत्युपकार से सन्तुष्ट हो सकता है, वैसा प्रत्युपकार ही संसार में दुर्लभ है अनादिकाल से चले आ रहे अनन्त गहन से भी गहन मोह से संसार-सागर में गिरे हुए स्वामी को प्रयत्नशील कुलस्त्रियाँ ही पार करा देती हैं। स्वामी के लिए कुलीन स्त्रियाँ ही सखा, बन्धु, सुहृद्‌, चाकर, गुरु, मित्र, धन, सुख, शास्त्र, घर, दास आदि सब कुछ हैं । सब तरह के प्रयत्नो से कुलीन स्त्रियो का निरन्तर पूजन करना चाहिए, क्योकि इहलोक और परलोक-दोनों का सम्पूर्ण सुख स्त्रियों में ही भलीभाँति निहित हे