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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 109, Verses 11–21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 109, verses 11–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 109 · श्लोक 11-21

संस्कृत श्लोक

सर्वं मुहूर्तध्यानेन चात्मोदन्तं ददर्श सः । आराज्यसंपरित्यागाद्वर्तमानक्षणक्रमम् ॥ ११ ॥ सर्वमालोक्य भूपालो विरराम समाधितः । समाधिविरतो हर्षविकासिनयनाम्बुजः ॥ १२ ॥ विसार्य तरसा बाहू पुलकोज्ज्वलतां गतौ । गलदङ्गं घनस्नेहं मुञ्चद्बाष्पं स्फुरत्स्पृहम् ॥ १३ ॥ आलिलिङ्ग चिरं कान्तां नकुलो नकुलीमिव । तयोरालिङ्गने तस्मिंस्तत्र भावो बभूव यः ॥ १४ ॥ न स वासुकिजिह्नाभिर्वक्तुं हर्षेण शक्यते । दिविस्थाविव पङ्केन कृताविव मिलत्तनू ॥ १५ ॥ शैलाविव समुत्कीर्णौ श्लिष्टावास्तां चिरं प्रियौ । मुहूर्तेन गलद्धर्मजलौ पुलकपीवरौ ॥ १६ ॥ बाहू विश्लथतामीषन्निन्यतुस्तौ शनैः प्रियौ । अमृतापूर्णहृदयौ संशून्यहृदयोपमौ ॥ १७ ॥ उन्मुक्तभुजमास्तां तावलक्षस्थितलोचनम् । घनानन्दक्षणं स्थित्वा तूष्णीं प्रणयपेशलम् ॥ १८ ॥ कान्तां चिबुकसंलग्नकरः प्रोवाच भूपतिः । अत्यन्तमधुरस्निग्धः कान्तः स्वकुलयोषिताम् ॥ १९ ॥ पुण्यश्च रतिनिष्पन्दः स्वादुर्नामामृतादपि । कियत्प्रमाणस्तन्वंग्या त्वया बालेन्दुमुग्धया ॥ २० ॥ अनुभूतश्चिरं क्लेशो भर्तुरर्थेन दारुणः । एवं दुरुत्तरात्तस्मात्संसारकुहरादहम् ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

राज्यत्याग से लेकर वर्तमान क्षणपर्यन्त हुई यावत्‌ घटनाओं का साक्षात्कार कर लेने के बाद राजा समाधि से विरत हो गये । जब समाधि टूट गई, तब हर्ष के मारे विकसित हुए नेत्रकमलवाले राजाने वेगपूर्वक रोमांचों के कारण उज्ज्वलता प्राप्त किये हाथों को फैलाकर अपनी कान्ता चूडाला को दीर्घ काल के बाद ऐसे आलिंगन किया, जैसे नेवला-नेवली का आलिंगन करे। उस समय उसके अंग विदीर्ण हो रहे थे, घन-स्नेह टपक रहा था, आँसुओं की धारा बह रही थी और अनुराग स्फुरित हो रहा था। हर्ष से पूर्ण उनके उस आलिंगन में जो अनिर्वचनीय परमानन्दरूप श्रृंगार का भाव व्यक्त हो रहा था, उसका शेषनाग भी अपनी जिह्ाओं से वर्णन नहीं कर सकते । जैसे अमावास्या के दिन सूर्य ओर चन्द्रमा एक दूसरे के शरीर में मिले हुए रहते हैं वैसे; गीली मिट्टी से बनाये गये मिले जोड़े के - जैसे, पाषाणशिला पर बनाई गई परस्पर आलिंगन की हुई दो श्लिष्ट मूर्तियों के-जैसे परस्पर आलिंगन किये हुए वे दोनों प्रीतिपूर्ण पति-पत्नी बहुत देर तक मिलित ही रहे । एक मुहूर्त के बाद जिन में से स्वेदजल टपक रहा था, जो रोमांचों से स्थूल हो गये थे, ऐसे अपने दोनों हाथों को उस स्निग्ध दम्पत्ति ने (पति-पत्नीने) धीरे धीरे कुछ शिथिल किया । उनके हृदय आनन्दामृत से पूर्ण थे, आनन्द के आधिक्य से उनका मन ऐसा जड़ बना था कि उसका परिज्ञान करने में कोई हेतु दूसरा प्रतीत नहीं हो रहा था अतएव वे एक तरह से ठीक शून्यहृदय हो गये थे। अपना-अपना हाथ छुड़ाकर और किसी खास लक्ष्य स्थान में नयनं को न लाकर यों ही वे कुछ कालतक स्थित रहे | घने आनन्द से विभोर क्षणभर मौन रहकर राजा शिखिध्वज चिबुकपर हाथ लगा कर चूडाला से प्रेममृदु वाणी कहने लगे : अहा ! अत्यन्त मधुर ओर स्नेहप्रचुर, कुलीन स्त्रियों का अनुराग कितना व्यापक रहता है, इसका वर्णन किसी तरह नहीं हो सकता, वह बड़ा सुन्दर और अमृत से भी स्वादिष्ट रहता है, साक्षात्‌ पुण्य ही अनुराग के रूप में अनुभूत होता है ॥ हे भद्रे, तुम्हारे सूक्ष्म अंग हैं, तुम बाल चन्द्रमा के सदृश अत्यन्त मुग्ध हो, अपने स्वामी के हेतु तुमने दीर्घकालतक कितना बड़ा दारुण क्लेश सहा प्रिये, इस तरह तुम्हारी जिस बुद्धि के द्वारा (स्वामी के प्रति स्नेहबुद्धि के द्वारा) दुस्तर उस संसाररूपी अन्धकार से मैं पार करा दिया गया, उसकी उपमा किससे दी जा सकती है अर्थात्‌ किसीसे भी नहीं