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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 109, Verses 62–76

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 109, verses 62–76 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 109 · श्लोक 62-76

संस्कृत श्लोक

शेषमेकं परित्यज्य तिष्ठामः कथमेव वा । चूडालोवाच । वयमाद्यन्तमध्येषु राजानो राजसत्तम ॥ ६२ ॥ मोहमेकं परित्यज्य भवामः पुनरेव ते । स्व एव नगरे राजा भव त्वं स्वासने स्थितः ॥ ६३ ॥ ललामो ननु कान्तानां महिषी ते भवाम्यहम् । सनृपा मत्तवास्तव्या नृत्यन्नवनवाङ्गना ॥ ६४ ॥ सपताका ध्वनत्तूर्या पुष्पप्रकरिणी पुरी । लसद्वल्ल्या समञ्जर्या रणत्पुष्पालिमालया । मधुमासलतालक्ष्म्या चिराद्भवतु सा समा ॥ ६५ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । इति चूडालया प्रोक्तो विहस्य स शिखिध्वजः । प्रोवाच मधुरं वाक्यमक्षुब्धं विगतज्वरः ॥ ६६ ॥ एवं चेत्तद्विशालाक्षि स्वायत्ता नस्त्रिविष्टपे । सिद्धभोगश्रियस्तासु निवसामि न किं प्रिये ॥ ६७ ॥ चूडालोवाच । न राजन्मम भोगेषु वाञ्छा नापि विभूतिषु । स्वभावस्य वशादेव यथाप्राप्तेन मे स्थितिः ॥ ६८ ॥ न सुखाय मम स्वर्गो न राज्यं नापि च क्रिया । यथास्थितमविक्षुब्धं तिष्ठामि स्वस्थचेष्टिता ॥ ६९ ॥ इदं सुखमिदं नेति मिथुने क्षयमागते । सममेव पदे शान्ते तिष्ठामीह यथासुखम् ॥ ७० ॥ शिखिध्वज उवाच । युक्तमुक्तं विशालाक्षि त्वयैतत्समया धिया । को वार्थः किल राज्यस्य ग्रहे त्यागेऽपि वा भवेत् ॥ ७१ ॥ सुखदुःखदशाचिन्तां त्यक्त्वा विगतमत्सरम् । यथासंस्थानमेवेमौ तिष्ठावः स्वस्थतां गतौ ॥ ७२ ॥ इति तत्र कथालापकथनेन तयोर्द्वयोः । कान्तयोश्चिरदंपत्योर्वासरस्तनुतां ययौ ॥ ७३ ॥ अथोत्थाय दिनाचारं यथाप्राप्तमनिन्दितौ । सोत्कण्ठावप्यनुत्कण्ठौ चक्रतुः कार्यकोविदौ ॥ ७४ ॥ स्वर्गसिद्धिमनादृत्य तस्थतुः पूर्णचेतसौ । एकस्मिन्नेव शयने तैस्तैः प्रणयचेष्टितैः । सा व्यतीयाय रजनी तयोर्जीवद्विमुक्तयोः ॥ ७५ ॥ तद्भोगमोक्षसुखमुत्तमयोः स्वय समाशंसतोः प्रणयवाक्यविलासगर्भम् । उत्कण्ठतां प्रणयिनोर्धियमानयन्ती दीर्घा मुहूर्तवदसौ रजनी जगाम ॥ ७६ ॥

हिन्दी अर्थ

राजा के अभिप्राय के अनुसार ही चूडाला भी उस उक्ति का अर्थ कहती है। चूडाला ने कहा : हे राजश्रेष्ठ, हम लोग आदि, अन्त और मध्य में राजा ही हैं, इसलिए केवल मोह छोड़कर फिर उस राजरूप में ही हो जायेंगे । अपने ही नगर में सिंहासन पर आरूढ़ आप राजा बन जाइये ओर अन्तःपुर की सब स्त्रियों की भूषणरूप मैं आपकी पटरानी बन जाऊँ ओर हे राजन्‌, अपनी जो नगरी है वह दीर्घकाल के बाद अनेक राजाओं से युक्त, प्रसन्न प्रजावर्ग से पूर्ण, नाच रही नई-नई अंगनाओं से शोभित, ध्वजाओं एवं बज रहे नगाड़ों से व्याप्त और नानाविध फुलवाड़ियों से सुहावनी होकर अब फिर लहलहा रही लता, मंजरी, एवं गुंजार कर रही मकरन्दासक्त भ्रमरपंक्तियों से युक्त वसन्त की लतालक्ष्मी के सदुश हो जाय । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, चूडाला ने उस प्रकार जब राजा शिखिध्वज से कहा, तब वे हँसकर नि:शंक हो चूडाला से क्षोभरहित और मधुरवाक्य कहने लगे । हे विशालाक्षि, हे प्रिये, यदि यही बात है, तो स्वर्ग में हम लोगों को जो स्वाधीन सिद्ध भोगलक्षिमयाँ मिल रहीं हैं, उन्हींमें निवास क्यो न करें चूडाला ने कहा : हे राजन्‌, हमको तो न भोगों की इच्छा है और न विभूतियों की ही इच्छा है। मेरी स्थिति तो स्वभाव के वश से जो भी कुछ प्राप्त हो जाता है, उसीके अनुसार रहती हे । मेरे सुख के लिए न तो स्वर्ग है, न राज्य है और न क्रियाकलाप ही है। केवल अपने स्वरूप में स्थिति के अनुकूल व्यापारों से युक्त होकर मैं स्थिति के अनुसार किसी तरह के क्षोभ के बिना स्थित रहती हूँ । यह सुख है और यह दुःख है, इस तरह के द्वन्द्रों का जब विनाश ही हो गया है, तब उसीके साथ-साथ इस शान्त पद में सुखपूर्वक स्थित ही हू। राजा शिखिध्वज ने कहा : हे विशालाक्षि, निर्विकार बुद्धि से तुमने जो यह कहा है वह ठीक ही है, क्योकि राज्य का ग्रहण करें या त्याग करें आत्मा का कौन-सा उपकार होगा। हे भद्रे, सुख-दुःख की अवस्थाओं के विषय में चिन्ता का परित्याग कर मात्सर्य से रहित होकर हम लोग जिस तरह से स्थित हैं उसी तरह से अपने स्वरूप में निष्ठ होकर स्थित रहें । इस प्रकार वहाँ पर परस्पर वार्तालाप के कथन से रमणीय उन दोनों पति-पत्नी का दिन समाप्तप्राय हो गया तदनन्तर उठकर दोषनिर्मुक्त उन दोनों शास्त्रविहित सायंसन्ध्या की। वे परस्पर अभीष्ट भोग के लिए उत्कण्ठित होते हुए भी वासना न रहने के कारण उत्कण्ठा से रहित थे और तत्‌-तत्‌ समय में प्राप्त कार्य के ज्ञाता थे। स्वर्ग की सिद्धि का अनादर कर पूर्णचित्त होकर वे दोनों एक ही शय्यापर सो गये और उन-उन प्रणय चेष्टाओं से जीवन्मुक्त उन दोनों की वह रात्रि व्यतीत हो गई । परस्पर के अनुभव से सिद्ध जो भोग और मोक्षरूप सुख था, उसकी-प्रणय-वचनों के विलासों के संमिश्रण से - प्रशंसा कर रहे उत्तम प्रेमी उस दम्पती की बुद्धि में उत्कण्ठा पैदा करानेवाली वह लम्बी रात भी मुहूर्त की नाई व्यतीत हो गई