Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 106

एक सौ पाँचवाँ सर्ग समाप्त एक सौ छठा सर्गं महेन्द्रपर्वत पर अग्नि के सामने उन दोनों का विवाह और सुवर्णं गुफा में पुष्पशय्या पर समागम-यह वर्णन ।

7 verse-groups

  1. Verses 1–26महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, तदनन्तर कुछ ही दिनों के बीत जाने पर वह कुम्भरूपधार…
  2. Verses 27–33इधर स्त्री-पुरुष के जोड़ों में प्रीति पैदा करनेवाली सखी त्रियामा रात्रि भी कुइयों के हास…
  3. Verses 34–39इसीलिए कामरूप से स्वामी की कल्पना कर मन में कहते है। यह मैं कमनीय वधू हूँ और हृदयस्थ आप भ…
  4. Verses 40–49राजा की उक्त शोभा का ही वर्णन करते हैँ । हे राजन्‌, आपकी प्रसिद्ध जो ये मालाएँ हैं, वे इन…
  5. Verses 50–57अब कल्पलता के रूप में उसका वर्णन करते है । हे मदनिके, तुम्हें मैं कल्पतरू वृक्ष की लता ही…
  6. Verses 58–69एक दूसरे को शरीर देने में उन्होने एक दूसरे को दान क्या दिया ? इस पर कहते है । एक दूसरे के…
  7. Verse 70भद्र, परस्पर अनिर्वचनीय प्रेमभरी मनोहर उन-उन वाणी के विलासो से तथा उस समय के लिए उचित आलि…