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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 106, Verses 27–33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 106, verses 27–33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 27-33

संस्कृत श्लोक

मिथुनैकसखीयामा कुमुदोत्करहासिनी । प्रालेयजालप्रकरं विकिरन्ती समाययौ ॥ २७ ॥ रत्नदीपान्बहून्सानौ कुम्भः सम्यगयोजयत् । ज्योतींषीन्द्वर्कयुक्तानि पद्मोद्भव इवाम्बरे ॥ २८ ॥ भूषयामास राजानं स्त्रीत्वं गच्छन्निशागमे । चन्दनागुरुकर्पूरपूरैर्मृगजकुङ्कुमैः ॥ २९ ॥ हारकेयूरकटकैस्तथा कल्पलतांशुकैः । स्रगुद्दामावतंसैश्च माल्यैश्च विविधोचितैः ॥ ३० ॥ तथा कल्पलतागुच्छैर्मन्दारैः पारिजातकैः । संतानैर्बहुरत्नैश्च मौलिना चेन्दुरूपिणा ॥ ३१ ॥ एतावताथ कालेन वधूत्वं कुम्भ आययौ । घनस्तनभराक्रान्तो बभूवाशु विलासवान् ॥ ३२ ॥ इदं संचिन्तयामास संपन्नोऽयमहं वधूः । कामायात्मा मया देयः कार्यं कालोचितं किल ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

इधर स्त्री-पुरुष के जोड़ों में प्रीति पैदा करनेवाली सखी त्रियामा रात्रि भी कुइयों के हास से युक्त हो तुषारसमूह बरसाती हुई आ गई । जिस तरह आकाशमण्डल में ब्रह्माजी ने चन्द्र ओर सूर्य से संयुक्त ज्योतिश्चक्र की योजना की है, उसी तरह मुनिवर कुम्भ ने भी इधर शिखर पर अनेक जाति के रत्नो से दीपको की योजना की। रात्रि के आगमन पर स्त्रीरूप धारण करनेवाले कुम्भ ने राजा को अनेक भूषणो से सजाया । उसे चन्दन ओर कपूर से मिलित केसर ओर कस्तूरी से; हार, केयूर ओर कंकणों से; कल्पलता से उत्पादित वस्त्रोसे; मालाओं के कारण उत्कृष्ट शोभावाले रत्नगुच्छे आदि उत्तम आभूषणों से; विविध भूषणो के लिए योग्य कण्ठादि मालाओं से; कल्पलताओं के गुच्छों से; मन्दार, पारिजात ओर सन्तान नामक देवतरू के फूलों से; बड़े बड़े अनेक रत्नों से तथा चन्द्र के सदृश कान्तिमान्‌ चूडामणि से खूब सजा दिया । इतने ही समय में महामुनि कुम्भ वधूरूपमें परिणत हो गये, घन रतनमण्डल के भार से भरित और तत्क्षण ही विलासी हो गये । अनन्तर उन्होने विचारा कि मैं यह वधू अब बन गया, अब यह कामरूप वर को शरीर दे देना चाहिए ओर कालोचित कृत्य अवश्य कर देना चाहिए