Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 106, Verse 70
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 106, verse 70 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 70
संस्कृत श्लोक
तैस्तैर्मिथः प्रणयपेशलवाग्विलासैस्तत्कालकार्यसुभगैः प्रणयोपचारैः ।
सत्कान्तयोर्नवनवेन तयोः सुखेन दीर्घा मुहूर्त इव सा रजनी जगाम ॥ ७० ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, परस्पर अनिर्वचनीय
प्रेमभरी मनोहर उन-उन वाणी के विलासो से तथा उस समय के लिए उचित आलिंगन आदि कृत्यो से
सुहावने गन्ध, माल्य, ताम्बूल के समर्पण आदि शुभ आचारो से जनित नवीन-नवीन संभोगसुख से
उस निर्मल दम्पती की लम्बी वह रात मुहूर्त के सदश बीत गई