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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 106, Verses 58–69

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 106, verses 58–69 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 58-69

संस्कृत श्लोक

चक्रतुर्दंपती तस्य पावकस्य प्रदक्षिणम् । स्वदायं ज्ञानसर्वस्वं हृदयं प्रेम चापलम् ॥ ५८ ॥ ददतुस्तौ मिथोऽन्योन्यस्मितकान्तमुखश्रियौ । प्रदक्षिणत्रयं कृत्वा लाजांस्त्यक्त्वाथ वह्नये ॥ ५९ ॥ भार्यावरौ समं तुष्टौ करौ तत्यजतुः क्रमात् । स्मयमानमुखौ कान्तौ चन्द्राविव नवोदितौ ॥ ६० ॥ पूर्वोपरचिते पुष्पतल्पे विविशतुर्नवे । एतस्मिन्नन्तरे चन्द्रश्चतुर्भागं नभस्तलात् ॥ ६१ ॥ शनैराक्रमयामास शोभां द्रष्टुमिवानयोः । तस्मिंश्च ललनाछिद्रं द्रष्टुं दृष्टिरिवाभितः ॥ ६२ ॥ लोलः संचरयामास करानिन्दुर्लतागृहे । तैस्तैर्नवकथालापैरिन्दावभ्युदिते त्वथ ॥ ६३ ॥ तावासांचक्रतुः कान्तौ दंपती सुमुहूर्तकम् । अथोत्थाय ज्वलद्रत्नदीपां काञ्चनकन्दराम् ॥ ६४ ॥ स्वयं पूर्वोपरचितां गुप्तां विविशतुः प्रियौ । ददर्शतुर्नवं तत्र तल्पं कुसुमकल्पितम् ॥ ६५ ॥ परितो व्याप्तमुत्कीर्णैर्हेमपङ्कजराशिभिः । मन्दारादिभिरन्यैश्च पुष्पैर्ग्लानिविवर्जितैः ॥ ६६ ॥ उच्चकैः सुप्रमाणेन निर्मितैः कुसुमैः समैः । दीर्घेन्दुबिम्बप्रतिमैस्तुषारस्थलशीतलैः ॥ ६७ ॥ क्षीरोदजलधाराभं ज्योत्स्नासंपिण्डसुन्दरम् । प्रतिबिम्बमनङ्गस्य नतं भित्ताविव स्थितम् ॥ ६८ ॥ सुगन्धमुन्नतं कान्तं चिरादन्यतयोत्थितम् । मिथुनं पुष्पराशौ तन्न्यषीदत्परितोऽमले । तस्मिन्समसमाभोगे क्षीरोदे मन्दरो यथा ॥ ६९ ॥

हिन्दी अर्थ

एक दूसरे को शरीर देने में उन्होने एक दूसरे को दान क्या दिया ? इस पर कहते है । एक दूसरे के प्रेम के लिए लोलुप, ज्ञानरूप सर्वोपरि धन से परिपूर्ण अपना-अपना हृदय ही उन्होने एक दूसरे को अपने-अपने दाय के रूप में दान दिया । एक दूसरे के प्रति किये गये स्मित हास से उनके कमनीय मुखमण्डल में महती शोभा झलक रही थी उन्होंने अग्नि की पहले तीन प्रदक्षिणाएँ कीं, फिर उसमें लाजा होम किया । इस वैवाहिक विधि से बराबर सन्तुष्ट होकर उस वर-वधू ने एक दूसरे द्वारा ग्रहण किया गया अपना-अपना हाथ छुड़ा लिया । उनके कान्तिपूर्ण, स्मित कर रहे मुख नवीन उदित दो चन्द्रमा के सदुश लग रहे थे । अनन्तर पहले से निर्मित नूतन फूलों के पलंग पर वे सोने के लिए चले गये। इसी बीच चन्द्र ने, आकाशतल से मानों इनकी शोभा निहारने के लिए, धीरे-धीरे रात्रि के चतुर्थभाग पर आक्रमण किया यानी वैवाहिक कृत्य करते-करते रात्रि का प्रथम प्रहर व्यतीत हो गया । जैसे चपल कामुक जनकी दृष्टि ललनाओं का छिद्र देखने के लिए एकान्त में अपनी किरणें फेंकती हे, वैसे ही चपल चन्द्रमा ने ललना का छिद्र देखने के लिए लतागृह में पुष्पशय्यापर अपनी किरणें फेंकी | अनन्तर पूर्णरूप से चन्द्र के उदित हो जाने पर संगम के लिए शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा कर रहे उस सुशोभित दम्पती ने प्रसिद्ध-प्रसिद्ध नवीन वार्तालापा से स्वल्प समय तक विश्राम लिया । अनन्तर उठकर उन दोनों प्रेमियों ने सुवर्णमय गुफा में, जिसमें कि चमकीले रत्नरूपी दीपक जल रहे थे, प्रवेश किया । इस गुफा का पहले से ही उन्होने स्वयं निर्माण कर रखा था । वह इतनी गुप्त थी कि इसमें चन्द्र के किरणों की गति भी नहीं हो सकती थी। प्रवेश करने के बाद उन्होने वहाँ पर कुसुमं से बना हुए एक नवीन पलंग देखा । वह चारों ओर खोदे गये सुवर्णमय कमलों से, दूसरे मन्दार आदि अम्लान पुष्पों से, शय्या जितनी ऊँची होती है, उतने ऊँचे सुन्दर बराबर सजाये गये कुसुमों से-जो कि शय्या के सदृश लम्बे चन्द्रविम्ब के सदृश प्रतीत हो रहे थे और तुषार-स्थली के सदृश शीतल थे - व्याप्त था । अधिक क्या कहें, वह सुन्दर शेय्या क्षीरसागर की जलधारा के सदृश धवल थी, चन्द्रज्योत्सना के पिण्ड के समान सुन्दर आह्लाद उत्पन्न करनेवाला था, भीत में पड़ा हुआ कामदेव का मानों प्रतिबिम्ब ही था, उसमें सुगन्ध तो भरी पड़ी थी, यथा-प्रमाण ऊँचा था, बड़ा ही रमणीय था । पूर्णरूप से निर्मल उस पुष्पराशि पर (पलंग पर) वह नवीन जोडा - जो कि राज छोड़ने के समय से लेकर अभी तक वह भ्रान्तिसुखानुभव देनेवाले उस पलंग पर वे, क्षीरसागर में मन्दराचल की नाई, शोभ रहे थे