Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 106, Verses 50–57
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 106, verses 50–57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 50-57
संस्कृत श्लोक
सुरक्तपल्लवकरा स्तनस्तबकधारिणी ।
त्वमनेकफला मन्ये कामकल्पतरोर्लता ॥ ५० ॥
हिमशीतावदाताङ्गी ज्योत्स्नाप्रसरहासिनी ।
पूर्णेन्दुश्रीरिवोद्युक्ता हृष्टैवाह्लादयस्यलम् ॥ ५१ ॥
तदुत्तिष्ठ वरारोहे वेदीं वैवाहिकीं स्वयम् ।
तत्र पुष्पलताजालैः काण्डं प्रति शिलाङ्कितैः ॥ ५२ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
मुक्ताकुसुमजालानां प्रकरैः स्तबकोपमैः ।
चतुर्दिक्कं चतुर्भिश्च नालिकेरमहाफलैः ॥ ५३ ॥
पूर्णकुम्भैस्तथा गङ्गावारिपूर्णैः प्रकल्पितैः ।
ज्वालयामासतुस्तस्या मध्ये चन्दनदारुभिः ॥ ५४ ॥
ज्वलनं ज्वालितज्वालं दक्षिणस्थं प्रदक्षिणम् ।
पूर्वाभिमुखमेवाग्नेरग्रे पल्लवविष्टरे ॥ ५५ ॥
नियोज्य दंपती कान्तौ तयोर्विविशतुः स्वयम् ।
स हुत्वा तिललाजानि पावकाय शिखिध्वजः ॥ ५६ ॥
उत्थायोत्थाय कान्तां स पाणिभ्यां स्वयमाददे ।
अन्योन्यं शोभमानौ तौ भवाविव वने शिवौ ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
अब कल्पलता के रूप में उसका वर्णन करते है ।
हे मदनिके, तुम्हें मैं कल्पतरू वृक्ष की लता ही मानता हूँ, क्योकि तुम्हारे हाथ ही सुन्दर लाल
पल्लव हैँ, ये स्तन ही तुमसे स्तवकों के रूप में धारण किये गये हैं और तुम अनेक फलों से लदी हो।
भद्रे, तुम्हारे अंग हिम के सदृश शीतल और निर्मल हैं, तुम्हारा हास्य ज्योत्स्ना का अनुकरण कर रहा
है - इन सबके कारण तुम उदित पूर्णचन्द्र की शोभा के सदुश हृष्ट होकर सुन्दर आह्वाद दे रही हो । हे
वरारोहे, अब चलो, तुम स्वयं ही विवाह की वेदी को अलंकृत करो । महाराज वसिष्ठजी ने कहा :
श्रीरामभद्र, तदनन्तर उन दोनों ने वेदी में लगे हुए जो खम्भे थे, उन्हें फूलवाली लताओं से सजाया । उन
लतार्ओं मे फलों के गुच्छों की तरह दिखाई पडनेवाले हीरा, मानिक आदि नव तरह के रत्नपाषाणों के
गुच्छे लगाये गये थे उसकी चारों दिशाएँ चार नारियल के फलों से तथा गंगाजल से परिपूर्ण नवरचित
चार घडो से सुशोभित की गई थी । उसके वाद वेदी के बीच में विवाह के लिए अग्नि की स्थापना करके
उसे चन्दन की लकड़ियों से उन्होंने प्रज्वलित किया । ज्वाला के प्रज्वलित हो जानेपर दाहिने ओर
स्थित उसकी प्रदक्षिणा की। फिर उसके आगे पल्लवो के आसनपर पूर्वाभिमुख होकर वे स्वयं बैठ गये ।
उस समय वे दोनों दम्पती बड़े ही कमनीय लगते थे | दोनों में से उस शिखिध्वज ने स्वयं तिल ओर
लाजा का अग्नि में होमकर बारबार उठ कर अपने हाथों से उस कान्ता मदनिका का परिग्रह किया |
अरण्य में गौरी ओर शंकर की नाई परस्पर सुशोभित हो रहे मंगलस्वरूप उस दम्पती ने अग्नि की
प्रदक्षिणा की