Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 106, Verses 40–49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 106, verses 40–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 40-49
संस्कृत श्लोक
इन्दोरिवांशुजालानि राजन्माल्यानि तानि ते ।
मेरुगङ्गाप्रवाहाभां धत्ते हारस्तवोरसि ॥ ४० ॥
मन्दारकुसुमप्रोतैः कुन्तलैर्नृप राजसे ।
कनकाब्जमिवोल्लोलैर्भृङ्गैः खचितकेसरैः ॥ ४१ ॥
रत्नांशुजालैः कुसुमैः श्रिया स्थैर्येण तेजसा ।
रत्नस्थानं विभो मेरुमभिभूयावतिष्ठसे ॥ ४२ ॥
एवमादि वदन्तौ तौ भविष्यन्नवदम्पती ।
प्रच्छन्नपूर्वदाम्पत्यौ मिथस्तुष्टौ बभूवतुः ॥ ४३ ॥
महाराज्ञीं मदनिकां महाराजः शिखिध्वजः ।
काञ्चनोपलपर्यङ्के निविष्टो भूषयत्स्वयम् ॥ ४४ ॥
अवतंसैस्तथा माल्यैर्मणिरत्नविभूषणैः ।
वस्त्रैर्विलेपनैः पुष्पै रुचिरस्थानकार्पितैः ॥ ४५ ॥
सा बभौ भूषिता तन्वी मदनी मददायिनी ।
गिरिजेव विवाहोत्का कामकान्तेव कामिनी ॥ ४६ ॥
महाराजो महाराज्ञीं भूषयित्वेदमाह ताम् ।
राजसे मृगशावाक्षि लक्ष्मीरिव नवोदिता ॥ ४७ ॥
शक्रेण सह यच्छच्या यल्लक्ष्म्या हरिणा सह ।
यद्गौर्याः शंभुना सार्धं तत्ते भवतु मङ्गलम् ॥ ४८ ॥
पद्मकोशाङ्कुरहृदा लोलनीलोत्पलेक्षणा ।
आमोदशुभझांकारा स्वास्थिता पद्मिनीव सा ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
राजा की उक्त शोभा का ही वर्णन करते हैँ ।
हे राजन्, आपकी प्रसिद्ध जो ये मालाएँ हैं, वे इन्दु की किरणों-सी मालूम पड़ती हैं और आपके
गले का यह जो हार है, वह मेरूपर्वत पर के गंगाप्रवाह की शोभा धारण कर रहा हे । हे नृप, मन्दार-
पुष्पों से गूथ गये केशों से आप ऐसे शोभित हो रहे हैं, जैसे केशरों से युक्त चंचल भ्रमरो से सुवर्णं
कमल शोभते हों । हे प्रभो, रत्नकिरणो, कुसुमों तथा स्थिर तेजोलक्ष्मी के कारण आप रत्नों के
स्थानभूत मेरूपर्वत का भी अतिक्रमण कर अवस्थित हैं । उस तरह के विविध वर्णन कर रहे वे कुछ
ही क्षण में होनेवाले दम्पती, जिनका कि पहले से ही गुप्त दाम्पत्य था, एक दूसरे से अत्यन्त सन्तुष्ट
हो रहे थे । इधर सुवर्णपत्थर के आसन पर बैठे हुए महाराज शिखिध्वज ने महारानी मदनिका को
स्वयं खूब सजाया । तत्-तत् विभूषण के लिए उपयोगी अंगों में समर्पित नानाविध अलंकारो से,
चमकीले मणि, रत्न आदि विभूषणं से युक्त मालाओं से, वस्त्रो से, अंगरागों से तथा फूलों से वह
कोमलांगी, मददायिनी मदनिका विवाह के लिए उत्कण्ठित गिरिजा ओर काम की पत्नी कामिनी रति
के सदृश शोभने लगी । महारानी मदनिका को सजाकर महाराजा शिखिध्वज ने कहा : हे मृग के बच्चे
सदृश नेत्रोवाली, अब तुम नवोत्पन्न लक्ष्मी की नाई शोभित हो रही हो | इन्द्र के साथ इन्द्राणी का
जो सौभाग्य है, भगवान् विष्णु के साथ लक्ष्मी का जो सौभाग्य है, शम्भु के साथ गौरी का जो सौभाग्य
है, वही सौभाग्य मेरे साथ तुम्हारा होवे । स्तन के पद्मकोश ओर अनुराग के सदृश अंकुरों से युक्त
हृदयवाली; नेत्रो के सदृश चंचल नीलोत्पलवाली ओर आमोदं के कारण मधुर भ्रमरझांकारोंवाली
विख्यात पद्मिनी के सदृश तुम अवस्थित हो