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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 67

छासठवाँ सर्ग समाप्त सड़सठवाँ सर्ग देह और आत्माका सम्बन्ध नहीं है, इसका समर्थन करने के लिए बन्धन अन्तःकरण की आसक्ति से होता है ओर अन्तःकरण की आसक्ति के त्याग से उसका विनाश हो जाता है, यह कथन |

25 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामचन्द्रजी, उन दोनों ने उस प्रकार संसार की असारता के विचा…
  2. Verse 2हे महाबाहो, इसलिए मैं कहता हूँ कि जाल के समान बन्धन के हेतुओं से परिपूर्ण चित्त को संसार-…
  3. Verse 3जैसे साधारण तुच्छ पक्षी के लिए दुस्तर सागर गरूड़जी के लिए गाय के खुरमात्र के समान है, वैस…
  4. Verse 4स्थूल और सूक्ष्म दो देहों में होनेवाले अभिमान का परित्याग ही संसार के उच्छेद का उपाय है,…
  5. Verse 5भले ही देह दुखों से अत्यन्त क्षुब्ध हो जाय, उससे हमें (आत्मा में) कौन सी क्षति पहुँची ? र…
  6. Verse 6हे श्रीरामचन्द्रजी, मन के क्षुब्ध हो जाने पर चित्स्वभाव आत्मा के पूर्णत्व-स्वरूप में क्या…
  7. Verse 7अहन्ता का त्याग होने पर किसी को भी कहीं पर भी ममता की प्राप्ति नहीं होती, इस अभिप्राय से…
  8. Verse 8श्रीरामजी, जिस प्रकार बीच-बीच में अनेक पर्वतों से व्याप्त होने पर भी उत्तर पर्वत और दक्षि…
  9. Verse 9अपनी गोद में धारण किये गये कमल भी जल के कौन होते है ? अर्थात्‌ जैसे कोई नहीं हैं, वैसे ही…
  10. Verse 10जैसे काठ और जल के अन्योन्य आघात से बड़े बड़े उत्तंग कण आदि उत्पन्न होते हैं, वैसे ही देह…
  11. Verse 11आत्मा का देह के साथ सम्बन्ध आध्यासिक है, इसमें दृष्टान्त कहते हैं। जैसे जल ओर काष्ठ के के…
  12. Verse 12जैसे दर्पण, तरंग आदि में पड़े हुए प्रतिबिम्ब वास्तव में न सत्य हैं और न असत्य हैं, किन्तु…
  13. Verse 13जैसे परस्पर आहत होने पर काठ, जल और पत्थर कभी भी दुःखित नहीं होते, वैसे ही पृथ्वी, जल, तेज…
  14. Verse 14जैसे काठ के साथ सम्बन्ध को प्राप्त जल से कम्प, शब्द आदि क्रियाओं की उत्पत्ति होती है, वैस…
  15. Verse 15भासमान सुख, दुःख आदि के अनुभव किसको होते हैं ? इस शंका पर किसी को नहीं होते, ऐसा समाधान क…
  16. Verse 16जैसे काठ और जल का सम्पर्कं होने पर उनमें से किसी को सुख ओर दुःख का अनुभव नहीं होता, वैसे…
  17. Verse 17तब तत्त्वज्ञ ओर अतत्त्वज्ञ दोनो में समानता ही रही, इस पर कहते है । अज्ञानी पुरुष जिस रूप…
  18. Verse 18तब ज्ञानी पुरुष को अपने प्रारब्ध के अनुसार होनेवाले भोगानुभव किस तरह के रहते हैं ? इस पर…
  19. Verse 19जैसे जल और काठ का सम्बन्ध भीतर के सम्बन्ध से रहित होता है, वैसे ही देह और देही आत्मा का स…
  20. Verse 20जैसे जल और काठ का तथा प्रतिबिम्ब ओर जल का सम्बन्ध अन्तःसंग से रहित यानी तादात्म्य सम्बन्ध…
  21. Verse 21पूर्वश्लोक में जल और काठ का दृष्टान्त संसर्गाभाव के बोधन केलिए और यहाँ तादात्म्य के अभाव…
  22. Verse 22जो असत्‌ है, उसका भी भरान्तिवश अस्तित्वरूप से भान होता है, यह कहते हैं। जैसे वेतालरूप से…
  23. Verse 23जैसे वास्तव में सम्बन्ध न होने पर स्वाप्निक अंगना के साथ क्रीडा आदि व्यापार में आध्यासिक…
  24. Verses 24–214जैसे जल और काठ का परस्पर सम्बन्ध असत्‌-प्राय (मिथ्यारूप ही) हे वैसे ही शरीर और परमात्मा क…
  25. Verse 215जैसे भीतरी सम्बन्ध का (अहन्ता के अध्यास का) अभाव होने के कारण काष्ठों के पतनों से जल पीड़…