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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 67, Verse 23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 67, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

असंबन्धोऽपि संबन्धो भवत्यन्तर्विनिश्चयात् । स्वप्नाङ्गनासुरतवत्स्थाणुवेतालसङ्गवत् ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे वास्तव में सम्बन्ध न होने पर स्वाप्निक अंगना के साथ क्रीडा आदि व्यापार में आध्यासिक सम्बन्ध हो जाता है अथवा जैसे वेतालरूप न होने पर ठ अधरे मे आध्यासिक सम्बन्धवश वेतालरूप हो जाता है, वैसे ही आत्मा के साथ वास्तव मेँ देह आदि का सम्बन्ध न होने पर भी मन की भावना से उसके साथ देहादि का आध्यासिक सम्बन्ध हो जाता हे