Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 6
12 verse-groups
- Verse 1छठा सर्ग पहले कर्मगतियोँ को कहकर जीवन्मुक्तिरूप अन्तिम जन्मवालोँ की जीवन्मुक्ति के लिए गु…
- Verse 2कर्मफलो मे आसक्ति होने के कारण ही अज्ञानियों को अनर्थ की प्राप्ति होती है, ऐसा दिखलाते है…
- Verse 3निषिद्धकर्म में निरत ओर सत्कर्म से विरत कोई लोग नरक से नरक, दुःख से दुःख और भय से भय को प…
- Verse 4नरको में उपभुक्त दुष्कर्म फलों के क्रम से तिर्यक् योनि में उत्पन्न हुए, अपने वासनारूप तन…
- Verse 5राजस-तामस और शुद्धतामस जीवो को कह कर शुद्धसात्विक जीवों को कहते है । कोई आत्मज्ञानी धन्य…
- Verse 6राजस-सात्विको को दिखलाते है । हे श्रीरामचन्द्रजी, पहले उत्तरोत्तर उत्कृष्ट कुछ ही मनुष्य…
- Verse 7उसकी शान्ति आदि गुणो से अभिवृद्धि कहते है । उत्पन्न होकर वह पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान…
- Verses 8–13जाते हैं एवं जैसे शरद् ऋतु में मेघ स्वच्छ हो जाते हैं वैसे ही उसमें पहले मलिन भी धैर्य,…
- Verse 14इस प्रकार गुणों की सम्पत्ति होने पर गुरुमुख से श्रवण में अधिकार होता है। अपक्व चित्तवाले…
- Verse 15इस प्रकार के गुणों से परिपूर्ण पुरुष को ही गुरुपूर्वक श्रवण आदि से साक्षात्कार प्राप्ति ह…
- Verses 16–17यह विचार से सुन्दर तथा शान्तचित्त से पहले आभ्यन्तर मनोमनन को ज्ञान के लिए बढ़ाता है। जो अ…
- Verse 18पूर्वोक्त अर्थ का संक्षेप से उपसंहार करते हैं। वे पूर्वोक्त गुणों से सम्पन्न अन्तिम जन्मव…