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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 6, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 6, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इमं विश्वपरिस्पन्दं करोमीत्यस्तवासनम् । प्रवर्तते यः कार्येषु स मुक्त इति मे मतिः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

छठा सर्ग पहले कर्मगतियोँ को कहकर जीवन्मुक्तिरूप अन्तिम जन्मवालोँ की जीवन्मुक्ति के लिए गुण प्राप्ति मं साधारण क्रम का कथन | आगे कहे जानेवाले गुणोपार्जन क्रम का प्रकृत में सम्बन्ध दिखाने के लिए प्रस्तुत अनासक्ति से किये गये अप्रतिषिद्ध कार्यो मे प्रवृत्ति द्वारा जीवन्मुक्त पुरुष का लक्षण कहते है । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जो पुरुष “भै श्रुति, स्मृति ओर सदाचार से प्राप्त, सकल व्यवहार को अयस्कान्त मणि के समान केवल अपनी सन्निधि से करता हूँ“, यों वासनारहित होकर कार्योमिं प्रवृत्त होता है, अज्ञानी के समान कर्तृत्वाभिमानपूर्वक प्रवृत्त नहीं होता, वह मुक्त है, ऐसा मेरा विश्वास है