Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 6, Verses 8–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 6, verses 8–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 8-13
संस्कृत श्लोक
यस्येदं जन्म पाश्चात्यं तमाश्वेव महामते ।
विशन्ति विद्या विमला मुक्ता वेणुमिवोत्तमम् ॥ ८ ॥
आर्यता हृद्यता मैत्री सौम्यता करुणा ज्ञता ।
समाश्रयन्ति तं नित्यमन्तःपुरमिवाङ्गनाः ॥ ९ ॥
यः कुर्वन्सर्वकार्याणि पुण्ये नष्टेऽथ तत्फले ।
समः सन्सर्वकार्येषु न तुष्यति न शोचति ॥ १० ॥
तमांसीव दिवा यान्ति तत्र द्वन्द्वानि संक्षयम् ।
शरदीव घनास्तत्र गुणा गच्छन्ति शुद्धताम् ॥ ११ ॥
पेशलाचारमधुरं सर्वे वाञ्छन्ति तं जनाः ।
वेणुं मधुरनिध्वानं वने वनमृगा इव ॥ १२ ॥
नरं पाश्चात्यजन्मानमेवंप्राया गुणश्रियः ।
जातमेवानुधावन्ति बलाका इव वारिदम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
जाते हैं एवं जैसे शरद् ऋतु में मेघ स्वच्छ हो जाते हैं वैसे ही उसमें पहले मलिन भी धैर्य, श्रद्धा आदि सब
गुण निर्मलता को प्राप्त हो जाते हैं। जैसे वन में वायु से छिद्रों के पूर्णं होने के कारण मधुर ध्वनिवाले
बोस को सब मृग चाहते हैं वैसे ही कोमल आचार से मधुरतावाले उस पुरुष को सब लोग चाहते हैं। जैसे
उत्पन्न होते ही मेघ के पीछे बक पंक्ति दौड़ती है, वैसे ही इस प्रकार की गुणशोभाएँ अन्तिम जन्मवाले
पुरुष का बचपन से ही अनुसरण करती है