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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 6, Verse 18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 6, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

प्रथितगुणान्सुगुरून्निषेव्य यत्नादमलधिया प्रविचार्य चित्तरत्नम् । गतिममलामुपयान्ति मानवास्ते परमवलोक्य चिरं प्रकाशमन्तः ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त अर्थ का संक्षेप से उपसंहार करते हैं। वे पूर्वोक्त गुणों से सम्पन्न अन्तिम जन्मवाले मनुष्य जिनके जीवन्मुक्तिरूप सुगुण प्रख्यात हैं, ऐसे सद्गुरुओं की प्रयत्न से सेवा कर उनसे प्रदर्शित युक्तियो से निर्मल हुई बुद्धि द्वारा चित्त के अन्तर्गत प्रत्यगात्मरूप रत्न का विचार कर, चित्त के अन्दर प्रकाशमान, प्रत्यगभिन्न ब्रह्म का चिरकाल तक साक्षात्कार कर उनके साक्षात्कार मात्र से ही ब्रह्मभाव आपत्तिस्वरूप निर्मल (माया और उसके कार्यरूपी मल से निर्मुक्त ) परम पुरुषार्थरूप गति को अपने स्थान में ही प्राप्त करते हैँ । उपासक के समान उत्क्रमणपूर्वक लोकान्तर मेँ जाकर नहीं, यह मतलब हे