Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 37
छत्तीसवाँ सर्ग समाप्त यैंतीसवाँ सर्ग प्रह्नाद के पुनः समाधिस्थ होने पर नायकरहित, अतएव दस्युओं द्वारा क्षत-विक्षत दानवनगर की दुर्दशा का वर्णन |
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे वत्स श्रीरामचन्द्रजी, शत्रुनाशक प्रह्ाद पूर्वोक्त आत्मा का चिन्त…
- Verse 2निर्विकल्प समाधि में स्थित स्वरूपसाग्राज्य को प्राप्त प्रह्लाद चित्रलिखित की तरह निश्चल अ…
- Verses 3–4अपने घर में समाधि में स्थित हो रहे प्रह्लाद का भुवन के बीच में स्थित मेरू की तरह बहुत समय…
- Verse 5इस प्रकार पत्थर पर गढ़े हुए सूर्य के समान निश्चल ब्रह्मस्वरूप वह शान्त असुरपुर में हजार व…
- Verse 6उस भूमा की दशा में अत्यन्त परिणति से प्रह्लाद जिसमें आनन्द का लेश नहीं ओर परमात्मा का आभा…
- Verse 7तदनन्तर इस बीच में वह पातालमण्डल अराजक और प्रबल मात्स्यन्याय से (बलवान् सजातीयो ओर विजात…
- Verse 8हिरण्यकशिपु के मर जाने और उसके पुत्र प्रह्लाद के समाधिस्थ होने पर पाताल में कोई दूसरा राज…
- Verse 9असुरो के अधिपति की चाहवाले उन दानवों के बड़े प्रयास से भी प्रह्लाद समाधि से प्रबुद्ध नहीं…
- Verse 10जैसे रात्रि मेँ भ्रमर जिसकी पंखुड़ियाँ विकसित हो रही हों ऐसे कमल को नहीं पा सकते वैसे ही…
- Verse 11जैसे जिससे सूर्य अस्त हो गये हों, ऐसी भूमि के अन्दर सोये हुए पुरुषों की स्नान, दान, गमन,…
- Verses 12–13तदनन्तर पहले भयभीत हुए निर्बल दैत्यों के अपने अभीष्ट देशों को चले जाने पर ओर बलवान् दैत्…
- Verses 14–17मत्स्यन्याय का ही उपपादन करते है । उसमें बलवानों द्वारा दुर्बलो के नगर छीने गये थे, मर्या…
- Verse 18वह असुर मण्डल चारों ओर से भयोद्रिग्न हो गया था, उसमें स्तर्यो, धन, मन्त्र, तन्निमित्तक यु…