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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 37, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 37, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इति संचिन्तयन्नेव प्रह्लादः परवीरहा । निर्विकल्पपरानन्दसमाधिं समुपाययौ ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे वत्स श्रीरामचन्द्रजी, शत्रुनाशक प्रह्ाद पूर्वोक्त आत्मा का चिन्तन करते- करते निर्विकल्प परमानन्दपूर्ण समाधि को प्राप्त हो गया

सर्ग सन्दर्भ

छत्तीसवाँ सर्ग समाप्त यैंतीसवाँ सर्ग प्रह्नाद के पुनः समाधिस्थ होने पर नायकरहित, अतएव दस्युओं द्वारा क्षत-विक्षत दानवनगर की दुर्दशा का वर्णन |