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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 37, Verses 3–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 37, verses 3–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 3 ,4

संस्कृत श्लोक

तथानुतिष्ठतस्तस्य कालो बहुतरो ययौ । स्वगृहे भुवनस्थस्य मेरोरिव सुरद्विषः ॥ ३ ॥ बोधितोऽप्यसुराधीशैर्नाबुध्यत महामतिः । अकाले बहुसेकोऽपि बीजकोशादिवाङ्कुरः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

अपने घर में समाधि में स्थित हो रहे प्रह्लाद का भुवन के बीच में स्थित मेरू की तरह बहुत समय बीत गया । असुरश्रेष्ठों द्वारा जगाने पर भी वह महामति जैसे बहुत सेक करने पर भी अकाल में बीज से अंकुर नहीं निकलता वैसे ही समाधि से विचलित नहीं हुआ