Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 27
11 verse-groups
- Verses 1–10शरीर से कुछ नहीं करता, क्योकि अचेतन शरीर भोक्ता नहीं हो सकता
- Verses 11–13जब मैं शरीर से कुछ नहीं करता, तब शरीराभिमान वृथा ही है, इसलिए वह त्याज्य ही है, ऐसा कहते…
- Verse 14देहादि द्वैत भले ही हो, तथापि उसकी क्षति से असग, पूर्ण, चिन्मात्ररूप मेरी कोड क्षति नहीं…
- Verses 15–19भले ही चित् का ही छिन्न हो, तथापि छ्य, छेदन आदि भाव और अभाव और तद्विषयक राग, द्वेष आदि भ…
- Verses 20–22इसी प्रकार कोऽहम्" (मैं कौन हूँ) इस प्रश्न का उत्तर भी स्वयं मुझे ज्ञात हो गया है, ऐसा क…
- Verses 23–25अपना आत्मा ही परमेश्वर है जिसने जीवभाव पर विजय प्राप्त कर ली, इसलिए उसे नमस्कार करते हैं।…
- Verse 26वर्तमान में असंवेद्य (चक्षु आदिवृत्तियों की व्यावृत्ति के लिए असंवेद्य कहा है) संवेदनरूप…
- Verse 27यदि कहिये कि हम इयत्ता (सीमा) में स्थापन को परिच्छेद नहीं कहते हैं, किन्तु तत््वावधारण को…
- Verse 28इनसे परिच्छेद होने पर बाएँ हाथ में रखे गये धन का दाहिने हाथ से ले जाने, हरने अथवा लौटाकर…
- Verse 29वस्तुतः तत्वबोध से पहले भी जगत मैं ही था, इसलिए पहले भी न तो कुछ उत्पन्न हुआ था और न विनष…
- Verses 30–35मैं एकमात्र यह चित् हूँ, चिद्रूप मेरा संकल्प और विकल्प से क्या बढ़ा और क्या विनष्ट हुआ ?…