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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 27, Verses 15–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 27, verses 15–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 15-19

संस्कृत श्लोक

चिता संचेतितो द्वेषो द्वेषो भवति नान्यथा । तस्माद्द्वेषादयः सर्वे भावाभावाश्चिदात्मकाः ॥ १५ ॥ न चितो व्यतिरेकेण प्रविचार्यापि किंचन । आसाद्यते किल स्फारादस्मात्त्रिभुवनोदरात् ॥ १६ ॥ न द्वेषोऽस्ति न रागोऽस्ति न मनो नास्य वृत्तयः । चिन्मात्रस्यातिशुद्धस्य विकल्पकलना कुतः ॥ १७ ॥ चिदहं सर्वगो व्यापी नित्यानन्दमयात्मकः । विकल्पकलनातीतो द्वितीयांशविवर्जितः ॥ १८ ॥ चितश्चिदिति यन्नाम निर्नामाया न नाम तत् । शब्दात्मिकैषा चिच्छक्तिः परिस्फुरति सर्वगा ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

भले ही चित्‌ का ही छिन्न हो, तथापि छ्य, छेदन आदि भाव और अभाव और तद्विषयक राग, द्वेष आदि भी, चित्‌ के आधीन ही उनकी कल्पना होने से चित्‌ से अतिरिक्त नहीं हैं, अतएव चित्‌ के प्रतिकूल कुछ नहीं हुआ, ऐसा कहते है। चित्‌ से यह द्वेष है यों संकेतित होने से द्वेष, द्वेष होता है, अन्यथा द्वेष नहीं होता; इसलिए द्वेष आदि सब भाव और अभाव चैतन्यरूप ही हैं । बहुत विचार करके भी चित्‌ से पृथक्‌ इस विशाल त्रिभुवन के मध्य से कुछ भी वस्तु प्राप्त नहीं होती है । अतिशुद्ध चेतनरूप मुझमें न द्वेष है, न अनुराग है, न मन है और न मन की वृत्तियाँ ही हैं | ये हों भी कैसे ? भला अतिशुद्ध चिन्मात्र में विकल्प कल्पना कैसे हो सकती है ? सर्वत्र जाननेवाला, सर्वव्यापक, नित्य आनन्दमयरूप, विकल्प-कल्पना से शून्य, द्वैत अंश से रहित मैं चित्‌ ही हूँ । नामरहित चित्‌ का जो 'चित्‌” यह नाम है, वह नाम नहीं है, यह सर्वत्र जानेवाली सब नाम-रूप कल्पना की अधिष्ठानभूत चित्‌-शक्ति ही नाम शब्द की तरह स्फुरित होती है