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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 27, Verses 11–13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 27, verses 11–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 27 · श्लोक 11-13

संस्कृत श्लोक

किमनेन शरीरेण काष्ठलोष्टसमेन मे । अशेषजगदेकात्मा चिदहं चेतनात्मकः ॥ ११ ॥ अहं चिदम्बरे भानावहं चिद्भूतपञ्जरे । सुरासुरेषु चिदहं स्थावरेषु चरेषु च ॥ १२ ॥ चिदस्तीह द्वितीया हि कल्पनैव न विद्यते । द्वित्वस्यासंभवाल्लोके कः शत्रुः कश्च वा सुहृत् ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

जब मैं शरीर से कुछ नहीं करता, तब शरीराभिमान वृथा ही है, इसलिए वह त्याज्य ही है, ऐसा कहते हैं। काठ और ढेले के समान इस जड़ शरीर से मेरा क्या प्रयोजन है ? चेतनरूप मैं सकल जगद्रूप चित्‌ ही हूँ। आकाश में चिद्रूप मैं हूँ, सूर्यादि के तेज में चिद्रूप मैं हूँ और अवशिष्ट तीनों भूतों में भी चिद्रूप मैं हूँ, सुर-असुरों में और स्थावर जंगमों में चिद्रूप मैं हूँ । यहाँ पर केवल चित्‌ ही है, दूसरी कल्पना ही नहीं है। लोक में द्वित्व का संभव न होने से कौन शत्रु है अथवा कौन मित्र है